अनकही बातें

बातें जो दिल से निकलीं ...पर ज़ुबां तक न पहुंची ...बस बीच में ही कहीं कलम से होती हुयी पन्नों पर अटक गयीं... यही कुछ है इन अनकही बातों में...

Friday, July 8

एक गज़ल

तेरी एक नज़र ने आज मुझे इस तरह सजाया है।
मिरे आगे आज तो कुछ चांद भी शरमाया है।

मांग मेरी मोती , सितारों से भर गई।
माथे पे मेरे आज महताब जगमागाया है।

लम्स ने तेरे मुझ पे जादू सा कर दिया।
हर शख्स मेरी जानिब तक के मुस्कुराया है।

एक खुनक सी बिखर गई है मौसम में ।
हवाओं ने फिर से कोई नया गीत गुनगुनाया है।

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तेरी कमगोई से पहले ही थे गिले बहुत,
चुप रह के सितम तुमने कुछ और भी ढाया है।

नम हो गईं महफिल में सभी की आंखे
हाले दिल उसने कुछ इस तरह सुनाया है।

1 Comments:

  • At Saturday, July 09, 2005 8:32:00 PM, Blogger अनूप भार्गव said…

    सारिका जी:
    सुन्दर गज़ल है , विशेष कर यह शेर :

    >नम हो गईं महफिल में सभी की आंखे
    >हाले दिल उसने कुछ इस तरह सुनाया है।

    एक शेर जोड़नें की कोशिश की है :

    वो पलक मूँद कर हौले से मुस्कुराये हैं
    उन के तसव्वुर में जानें कौन आया है ।

    अनूप

     

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