Author: सारिका सक्सेना
•8:51:00 PM

पढने के शौक के चलते यूं तो ये उपन्यास पहले शायद 9th में पढा था, मगर कुछ भी याद नहीं था। पिछले दिनों बैंगलौर बुक फेयर में हिन्दी के इक्लौते स्टाल पर जब गुनाहों का देवता दिखाई दिया तो सोंचा इसे भी अपने पुस्तकों के संकलन में शामिल कर लें।
इतवार को कुछ वक्त मिला तो सोंचा इसे पढना शुरु कर देते हैं। आराम से कम से कम एक हफ्ते में पढ जायेगा। पर पढना शुरु करने के बाद अपने आप को रोकना मुश्किल था। कल शाम को इसे खत्म करने के बाद मन एक अजीब सी उदासी से घिरा हुआ है। एक अजीब सा भारीपन है जिसे समझना मुश्किल सा लग रहा है। सोंचा था बहुत कुछ लिखेंगे, पर मन अभी भी उन पात्रों के बीच भटका हुआ है। जिन्होंने भी गुनाहों का देवता पढा है, वो मेरी हालत समझ पा रहे होंगे।
वैसे देखा जाय तो ये एक सीधी सी कहानी है, पर भावनाओं से एकदूसरे से बंधे सभी पात्र और कहानी विलक्षण हैं। कभी ये पात्र अपने बीच के से लगते हैं तो कभी किसी दूसरी दुनिया के से। सुधा और चंदर मुख्य पात्र हैं बहुत ज्यादा प्रभावित करते हैं। वे एकदूसरे से इतना प्यार करते हैं कि उसकी पराकाष्टा बलिदान और त्याग में होती है। वे एक ओर महान हैं तो दूसरी ओर उनमें मनुष्यगत कम्जोरियां भी हैं, इन्हें वे स्वीकार भी करते हैं । पर हमारा पसंदीदा चरित्र बिनती का है। जो एक साधारण और व्यवहारिक लडकी है। उसके चरित्र में आरम्भ से अंत तक जो परिवर्तन दिखाया गया है, वो आशा की ओर ले जाता है।
आधा उपन्यास पढने के बाद ही पता नहीं क्यों अहसास हो गया था कि सुधा को तो जाना ही है। और जो उपसंहार है , लगता है इससे बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता था।
शायद कुछ दिन बाद, या कुछ साल बाद इसे दोबारा पढेंगे, तब शायद कुछ और गहराई से समझ पायेंगे।
किताब का आखरी अंश बहुत ही सुंदर है;

.....चीख से चन्दर जैसे होश में आ गया। थोडी देर चुपचाप रहा फिर झुककर अंजलि में पानी लेकर मुंह धोया और बिनती के आंचल से पोंछकर बहुत मधुर स्वर में बोला-"बिनती, रोओ मत! मेरी समझ में कुछ नहीं आता कुछ भी! रोओ मत!" चन्दर का गला भर आया और आंसू छलक आये-"चुप हो जाओ रानी!मैं अब इस तरह कभी नहीं करूंगा-उठो! अब हम दोनों को निभाना है, बिनती!" चन्दर ने तख्त पर छीना छपटी में बिख्ररी हुई राख चुटकी में उठाई और बिनती की मांग में भरकर मांग चूम ली। उसके होंठ राख से सन गये।
सितारे टूट चुके थे। तूफान खत्म हो चुका था।
नाव किनारे पर आकर लग गई थी-मल्लाह को चुपचाप रुपये देकर बिनती का हांथ थामकर चन्दर ठोस धरती पर उतर पडा....'मुरदा चांदनी में दो छायाएं मिलती-जुलती हुई चल दीं।
गंगा की लहरों मे बनता हुआ राख का सांप टूट फूट कर बिखर चुका थाऔर नदी फिर उसी तरह बहने लगी थी जैसे कभी कुछ हुआ ही न हो।
Author: सारिका सक्सेना
•4:56:00 AM
पिछले कुछ दिनों से अपने गर्दन और सीधे हांथ के दर्द की वजह से कुछ भी काम करने में असमर्थ थे। मेरी आठ साल की बेटी हर वक्त हमारी मदद को हाज़िर थी। उसी ने कल एक पुरानी डायरी ला कर दी और पूछा ये आपकी है क्या। हमने उसके हांथो से वो पुरानी यादें लेकर उलटना पुलटना शुरु कर दिया। सबसे पहले नज़र अटक गई एक कविता पर जो हमने उसके(कांती) के जन्म के कुछ दिन बाद ही लिखी थी। सोंचा आज वही कविता अपने ब्लाग पर पोस्ट कर देते हैं।

अभी तो बस तुम
मुझमें ही थीं;
मेरे रोम-रोम में बसी
मेरे अंतर में थी।
ये तुमसे अपनी नज़दीकी
कुछ असह सी होते हुये भी
मुझे बहुत प्रिय थी।
तुम मेरे अंदर
हर पल कसमसाती हुई
अपने होने का अहसास दिलाती थी।
मेरा मन तुम्हारे इंतज़ार में
हज़ारों सपने बुनता था।
सपनों के साथ ही;
सपनों जैसे...
कितने ही मोजों और टोपों ने
भी तो आकार लिये थे।
और अब....
दर्द के एक लम्बे सागर को
पार करने के बाद
तुम मेरी बाहों में हो।
कितनी मासूम!
कितनी कोमल!
जैसे नन्हीं सी कोई
कली हो।
कल अपने तोतले बोलों में
तुम मुझे "मां" कहोगी।
"मां" ये छोटा सा शब्द ही तो
मुझे सम्पूर्ण
और परिभाषित करता है।



Author: सारिका सक्सेना
•10:24:00 AM


Happy Deepawali




Author: सारिका सक्सेना
•9:56:00 PM

मेरी बारिश
मेरा आकाश
मेरी धूप
कितना कुछ तो है
मेरे पास
मुट्ठी में रेत सा दरकता
मेरा वजूद
मेरी सुबहें
मेरी दुपहरें
इंतज़ार से बोझिल
सुनहरी शामें
और खामोश रात
कितना कुछ तो है
मेरे पास
तेरी सौगात
..
Author: सारिका सक्सेना
•9:55:00 AM

सूरज ने अपनी किरणों की तूलिका को
सुनहरे, नारंगी रंगो में डुबा कर
कुछ ऎसे छुआ कि;
लाज की लाली से अवनि और भी
रुपहली हो गई।

तेरे नाम से जुडा मेरा नाम
कुछ इस तरह कि
हर्फ़ तो थे वही बस
फ़लक और ज़मी की क्षितिज पर
शनासाई हो गई।
Author: सारिका सक्सेना
•2:32:00 AM


वक्त कैसे पंख लगा कर तेजी से उड जाता है पता ही नहीं चलता। अपनी पिछली पोस्ट करीब तीन साल पहले लिखी थी। सोंचो तो लगता है जैसे कल ही की बात है।हमारी नन्ही कली (जिसकी वजह से हमने इस ब्लाग से विराम लिया था) ने प्ले स्कूल जाना शुरु कर दिया है और हमें कुछ वक्त अपने लिये मिलना शुरु हो गया है। पिछले कई दिनों से हिन्दी ब्लाग जगत में आये नये (जो अब नये नहीं रहे) लोगों को और पुराने दिग्गजों को पढने में लगे थे। कुछ पढ पाया है और कुछ अभी बाकी है। हिन्दी ब्लाग जगत सच काफ़ी आगे निकल चुका है। प्रतिभा की कहीं कोई कमी नहीं है। इतना कुछ खूबसूरत पढने को मिल रहा है कि बस डूब कर पढने में वक्त कहां चला जाता है पता ही नहीं चलता। कोशिश करेंगे कि अब जुडे रहें यहां से, और साथ ही कुछ नया लिखे भी।