अनकही बातें
बातें जो दिल से निकलीं ...पर ज़ुबां तक न पहुंची ...बस बीच में ही कहीं कलम से होती हुयी पन्नों पर अटक गयीं... यही कुछ है इन अनकही बातों में...
Tuesday, May 17, 2011
Tuesday, February 08, 2011
Thursday, February 03, 2011
Saturday, December 25, 2010
ख़्वाब
कच्ची मिटटी से थे
जो ख़्वाब कल बनाए थे,
चलो आज पका लें उन्हें
अपने हांथो की
गर्मी से, अपनी साँसों की तपिश से
की ख़्वाब हैं ये तो
इन्हें चाहिये बस
हांथों की नरमी और साँसों की नर्मी
नहीं मिला जो इन्हें
तेरी बाहों का सहारा
तो बह जायेंगे आंसुओं के
समंदर में.......
जो ख़्वाब कल बनाए थे,
चलो आज पका लें उन्हें
अपने हांथो की
गर्मी से, अपनी साँसों की तपिश से
की ख़्वाब हैं ये तो
इन्हें चाहिये बस
हांथों की नरमी और साँसों की नर्मी
नहीं मिला जो इन्हें
तेरी बाहों का सहारा
तो बह जायेंगे आंसुओं के
समंदर में.......
Wednesday, December 01, 2010
काहे को ब्याही बिदेस...
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| पापा-मम्मी |
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| Family photograph |
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| पापा-मम्मी बैंगलौर में... |
आज ये सब बातें हम इसलिए सोंचने बैठे हैं क्योंकि हम अपने मम्मी पापा को बहुत याद कर रहे हैं| पता नहीं क्यों उन्हें इतना याद करने पर भी हम उनसे फोन पर बात नहीं कर पाते| पिछले करीब दो महीने वो लोग हमारे साथ बैंगलौर में थे| वो दो महीने उनके साथ कैसे बीत गए पता ही नहीं चले| वेंकट यू एस गए हुए थे...हमने ये सारा वक्त मम्मी पापा के साथ ऐसे गुज़ारा जैसे शादी से पहले रहते थे| मम्मी ने पूरा किचन संभाल लिया था | रोज़ दोपहर -शाम को गरम- गरम खाना तो जैसे भूल गए थे| खुद बना कर खाने में वो मज़ा कहाँ है जो माँ के हाँथ के बनाए खाने में है| मम्मी पापा की वजह से ही अपना इतने दिनों का बिसराया शौक फिर से शुरू कर दिया| घर -ग्रहस्थी के चक्कर में हम जो क्राफ्ट बिलकुल भूल गए थे वो उन लोगों के कहने से फिर शुरू कर दिया| कोई भी नयी चीज़ बना कर उन लोगों को दिखाने में कितना अच्छा लगता था| और पापा हमेशा तारीफ़ करने के साथ expert comment देना नहीं भूलते थे|
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| My Dashing Papa |
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| हमारी शादी.. |
आज उन लोगों को वापस गए तीन हफ्ते हो गए हैं| जिंदगी पहले जैसी कल रही है पर दोपहर में जब अकेले खाना खाने बैठते हैं तो न चाहते हुए भी आंसू आ जाते हैं| पेट भी नहीं भरता, रात को फिर बच्चों के और वेंकट के साथ खाकर पेट भरता है|
I really miss you papa- mummy!
काश आप हमेशा हमारे पास रह सकते|
Monday, September 20, 2010
...एक अनकही कहानी!
लिखना कभी उसका पैशन हुआ करता था.. कुछ लिखे बिना उसे जीना नहीं आता था, लिखना जैसे की उसके लिए सांस लेना जैसा था. कुछ कविता या नज़्म नहीं तो डायरी या फिर यूँ ही बेलौस बस लिखे जाना उसकी आदत सी थी. अगर वो कुछ पढ़ती भी तो उसकी कलम उसके साथ होती थी. किताब पर वो कुछ नहीं लिखती थी पर उसकी साफ़ शफ्फाक किताबों में रक्खी छोटी छोटी पर्चियों में उसकी समझ के अनुसार वो किताब पढ़ी जा सकती थी. उसके पर्स में हमेशा एक सफ़ेद पन्ना और एक कलम जरुर होती थी. पर अपने लिखे हुए को वो संभाल कर नहीं रखती थी ये भी उसकी सभी अजीब आदतों सी एक आदत थी. अपनी आदतों में बंधी हुई थी, और अपनी आदतों से अलग कुछ करने में वो परेशान हो जाती थी, झुंझला जाती थी. एक बंधे बंधाये रूटीन में उसकी ज़िन्दगी चलती थी. बस इसी तरह जीना उसे आता था.....
और फिर एक दिन उसकी ज़िन्दगी ने करवट ली, वक्त की डाली पर एक नयी कोंपल नए मौसम के साथ यूँ उगी की पूरी फिजा ही बदल गयी. मुस्कुराहटों के मौसम छा गए. अब अपनी खुली किताब सी ज़िन्दगी वो छिपाने लगी. उसे लगता की उसके जज्बे कोई उसके चहरे पर ही न पढ़ ले. और लिखना तो बस यूँ ही बंद हो गया. अब वो पढ़ती भी तो कुछ लिखती नहीं की कोई कुछ अंदाजे न लगा ले. यूँ सबसे सब कुछ छिपा कर रखना भी उसकी आदत सी हो गई..अब वो सपनों में जीती थी, उसके ख़्वाब उसकी अमानत थे..और वो अपने ख़्वाबों की दुनिया की शहजादी थी..अब वो लिखती नहीं थी, अपने शब्दों को खुद जीती थी, वो एक जीती जागती कहानी बन गयी थी....एक अनकही कहानी!
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