Thursday, August 21, 2014

यादों वाला आँगन

कल रात फिर वही बचपन की यादों वाला आँगन सपने में आया, और आँगन के छोर पर वो छोटी सी बगिया, जिसकी एक एक चीज़ अभी भी याद है; मेहंदी के दो पेड़, दो पेड़ गुढहल के लाल फूलों वाले, एक हरसिंगार जिसके नीचे रोज सुबह फूलों की चादर बिछ जाती थी, एक छोटा अमरूद और बीच बीच में  मौसमी फूलों और सब्जियों की क्यारियाँ| हम तीनों अपनी अपनी क्यारियाँ बाँट लिया करते थे और सुबह उठाकर सबसे पहले जाकर देखते के किसकी क्यारी में कौन सा किल्ला फूटा| 
सर्दियों की छोटी दोपहारों में इसी आँगन में धूप सेंकते हुए कोई किताब पढ़ते थे और गर्मियो की शाम से ही यहाँ पानी छिड़का कर चारपाइयों पर बिस्तर लग जाते थे, और हम देर रात तक ढेर सारे तारों के तले खुसुर-पुसुर करते हुए नींद की गोद में चले जाते थे| 
इसी आँगन की नीरवता में एक दिन मन में एक कविता ने जन्म लिया था|हमारे दिन और रात उसी आँगन में शुरू और ख़त्म होते थे| कभी किसी खिलौने या टीवी , कंप्यूटर की ज़रूरत नहीं थी हमें| जब दीदी बहन से ज़्यादा पक्की सहेली थी और भइया सबसे अच्छा दोस्त| बिना खिलौनों के दुनिया भर के खेल हमने यहीं पर खेले और पढ़ाई भी यहीं पर की. यादों में वो आँगन बहुत विशालकाय था, जहाँ हम विष-अमृत और छुआ-छुआरी खेलते थे, इसी आँगन में बैठ कर हज़ारों सपने देखे थे, और पंखों को उड़ान देनी चाही थी, तब उस आँगन को छोड़ कर जाना ही अपनी नियती लगती थी, कभी सोंचा नहीं था उस वक्त की यह आँगन एक प्यारा सा सपना बन जायगा जो हमें अक्सर सुबह की नींद से जगाएगा|आज अगर वो आँगन होता तो शायद सिकुड गया होता बाकी पूरे शहर की तरह|

Sunday, June 01, 2014

जून

तम से भरे मन के गगन में तुम दीप के जैसे जले. 

जून की इस तपन में तुम छाँव के जैसे मिले! 

Thursday, May 15, 2014

मई

चिलचिलाती धूप ले कर आ गई जबसे मई,
संग तेरे होने लगी है ज़िंदगी फिर से नई


Wednesday, December 11, 2013

नज़्म

कुछ आड़ी तिरछी  लकीरें
जो मेरी उँगलियों की राह होते हुए
पन्नों पर खिंच जाया करती थीं
और शक्ल देतीं थी किसी नज़्म को
वो होती तो मेरा एक हिस्सा ही थीं
जो मेरे होने को
एक और मानी सा देतीं थीं ......
....पर बहुत दिन हुए
ये शब्द अब उमड़ते ही नहीं ....
न लेते हैं कोई शक्ल नज़मों की
बस उदास, हैरान ठहरे रहते हैं
मन के अंदर ही
जैसे मुख़्तसर हों किसी तूफ़ान के…

कभी कभी कुछ तूफ़ान जरूरी होते हैं .

Tuesday, May 17, 2011

तेरे आने की आहट से

 
तेरे आने की आहट से
फिजायें रंग लायीं हैं|
खिले हैं फूल गुलशन में,
बहारें मुस्कुराई हैं|

शरारत की है मौसम ने
फलक से घूँघट हटाया है
चमक उट्ठी है हर सू यूँ
सुबह ओस में नहाई है|

रूह ने किये सिंगार सोलह
बदन कोरा था पर अब तक
तेरी बाहों के घेरे में ,
शाम सिंदूरी हो आई है|

Tuesday, February 08, 2011

तुझको सबकुछ ख़त में लिखना

तुझको सबकुछ ख़त में लिखना
जीस्त जैसे तेरे नाम हो लिखना

आँख नहीं हटती है तुझसे
चाँद समझकर तुझको तकना

हर एक गली जैसे तेरा घर हो
हर इक मोड़ पे ऐसे रुकना

आकर कहीं फिर जा न सको तुम
कभी तो ऐसे खुल के मिलना

तेरी याद के मौसम में फिर
ज़ख्मों का फूलों सा खिलना

अपने हांथों की रेखा में
मेरा भी कभी नाम तो लिखना