Wednesday, December 11, 2013

नज़्म

कुछ आड़ी तिरछी  लकीरें
जो मेरी उँगलियों की राह होते हुए
पन्नों पर खिंच जाया करती थीं
और शक्ल देतीं थी किसी नज़्म को
वो होती तो मेरा एक हिस्सा ही थीं
जो मेरे होने को
एक और मानी सा देतीं थीं ......
....पर बहुत दिन हुए
ये शब्द अब उमड़ते ही नहीं ....
न लेते हैं कोई शक्ल नज़मों की
बस उदास, हैरान ठहरे रहते हैं
मन के अंदर ही
जैसे मुख़्तसर हों किसी तूफ़ान के…

कभी कभी कुछ तूफ़ान जरूरी होते हैं .

Tuesday, May 17, 2011

तेरे आने की आहट से

 
तेरे आने की आहट से
फिजायें रंग लायीं हैं|
खिले हैं फूल गुलशन में,
बहारें मुस्कुराई हैं|

शरारत की है मौसम ने
फलक से घूँघट हटाया है
चमक उट्ठी है हर सू यूँ
सुबह ओस में नहाई है|

रूह ने किये सिंगार सोलह
बदन कोरा था पर अब तक
तेरी बाहों के घेरे में ,
शाम सिंदूरी हो आई है|

Tuesday, February 08, 2011

तुझको सबकुछ ख़त में लिखना

तुझको सबकुछ ख़त में लिखना
जीस्त जैसे तेरे नाम हो लिखना

आँख नहीं हटती है तुझसे
चाँद समझकर तुझको तकना

हर एक गली जैसे तेरा घर हो
हर इक मोड़ पे ऐसे रुकना

आकर कहीं फिर जा न सको तुम
कभी तो ऐसे खुल के मिलना

तेरी याद के मौसम में फिर
ज़ख्मों का फूलों सा खिलना

अपने हांथों की रेखा में
मेरा भी कभी नाम तो लिखना

Thursday, February 03, 2011

नज्म

तेरी नज़रों के हिसार में
अब हर वक्त
कैद रहती हूँ मैं.
चाहूँ भीं तो बच नहीं सकती
कुछ ऐसे खुद को खो बैठी हूँ मैं.
तेरी रफाकत के इस आलम में
दर्द ही हासिल है बस,
तू नहीं तेरी प्यास से
दिल को लगा बैठी हूँ मैं.

Saturday, December 25, 2010

ख़्वाब

कच्ची मिटटी से थे
जो ख़्वाब  कल बनाए थे,
चलो  आज पका लें उन्हें
अपने हांथो की
गर्मी से, अपनी साँसों की तपिश से
की ख़्वाब हैं ये तो
इन्हें चाहिये बस
हांथों की नरमी और साँसों की नर्मी
नहीं मिला जो इन्हें
तेरी बाहों का सहारा
तो बह जायेंगे आंसुओं के
समंदर में.......

Wednesday, December 01, 2010

काहे को ब्याही बिदेस...

पापा-मम्मी
Family photograph
पापा-मम्मी बैंगलौर में...
आज यूँ ही जाने क्यों जीवन के जाने अनजाने कितने ही रिश्तों के बारे में सोंचने बैठ गए हैं| अजीब होते हैं न ये रिश्ते भी...क्यों बनते हैं, कैसे बनते हैं और कैसे जीवन की हर एक डगर पर नए-नए रूप लेते रहते हैं|  हम सोंच रहे हैं उस रिश्ते के बारे में जो जन्म से पहले ही बंध जाता है- एक बच्चे का उसके माता-पिता से रिश्ता| कहीं पढ़ा था की आत्मा खुद चुनती है अपने नए जन्म में अपने माँ-बाप को| ये रिश्ता होता ही है ऐसा गहरा.. एक माँ  के लिए उसका बच्चा उसकी दुनिया होता है और बच्चे के लिए उसकी दुनिया उसकी माँ तक ही सीमित होती है| पर जैसे जैसे बच्चा बड़ा होता जाता है उसकी दुनिया उसके साथ ही बढती जाती है|

 आज ये सब बातें हम इसलिए सोंचने बैठे  हैं क्योंकि  हम अपने मम्मी पापा को बहुत याद कर रहे हैं| पता नहीं क्यों उन्हें इतना याद करने पर भी हम उनसे फोन पर बात नहीं कर पाते| पिछले  करीब दो महीने  वो लोग हमारे साथ बैंगलौर में थे| वो दो  महीने उनके साथ कैसे बीत गए पता ही नहीं चले| वेंकट यू एस गए हुए थे...हमने ये सारा वक्त मम्मी पापा के साथ ऐसे गुज़ारा जैसे शादी से पहले रहते थे| मम्मी ने पूरा किचन संभाल लिया था | रोज़ दोपहर -शाम को गरम- गरम खाना तो जैसे भूल गए थे| खुद बना कर खाने में वो मज़ा कहाँ है जो माँ के हाँथ के बनाए खाने में है| मम्मी पापा की वजह से ही अपना इतने दिनों का बिसराया शौक फिर से शुरू कर दिया| घर -ग्रहस्थी के चक्कर में हम जो क्राफ्ट बिलकुल भूल गए थे वो उन लोगों के कहने से फिर शुरू कर दिया| कोई भी नयी चीज़ बना कर उन लोगों को दिखाने में कितना अच्छा लगता था| और पापा हमेशा तारीफ़ करने के साथ expert comment देना नहीं भूलते थे|

My Dashing Papa
क्यूँ ऐसा होता है की शादी करने के बाद लड़कियों को घर छोड़कर जाना पड़ता है|  वैसे तो लडके भी आजकल अपने माता-पिता के साथ नहीं रहते| पर उनकी मजबूरी लड़कियों जैसी नहीं होती| आज पता नहीं क्यों हम इतना भावुक हो रहे हैं| अपनी शादी के बाद की विदाई याद आ रही है; जो कि बिलकुल भी नार्मल विदाई जैसी नहीं थी| पापा की वजह से ही हमारी शादी एक अध्यात्मिक समारोह में हुई थी| हमारे गुरु जी ने हमारे लिए जाती, भाषा, प्रदेश इन सबों से परे हमारे लिए वेंकट को चुना था| शादी हुई थी कलकत्ता में, हम थे फतेहगढ़ से, ससुराल थी हैदाराबद में, और पति देव रहते थे मिशिगन यू एस में. विदाई भी बहुत कन्फ्यूज्ड सी थी| रेलवे स्टेशन पर पापा कि वापसी कि ट्रेन थी प्लेटफार्म नम्बर १० पर और हमारी ट्रेन थी २ नम्बर पर| पापा स्टेशन पर पहले ही पहुँच चुके थे, और हम लोग ट्रैफिक के चलते लेट हो चुके थे| किसी तरह भागते दौड़ते पापा कि ट्रेन तक पहुंचे, कुछ बात भी नहीं कर पाए थे कि ट्रेन ने सिग्नल दे दिया| हमेशा से ही हम इतना शर्मीले थे कि पापा मम्मी तक से गले नहीं लग पाए| आज इसे लिखते हुए आँखे भर आई हैं|  अपनी अंतरजातीय, अन्तर्प्रदेशीय शादी पर हमें यूँ तो बहुत गर्व है,सात फेरे न होने का कोई अफसोस नहीं  पर आज भी पारंपरिक विदाई न होने का हमें अफसोस है|  काश अपने पापा- मम्मी से विदा होते हुए हम बिलख-बिलख के रो लिए होते तो मन में ये हमेश फांस सी न चुभती|  अब भी जब पापा -मां हमारे घर से जा रहे होते हैं, या हम फतेहगढ़ से आ रहे होते हैं तो हम अपनी भावनाए खुल कर दिखा  नहीं पाते| उनके सामने रोना छुपाते रहते है और बाद में अकेले में मन का गुबार निकलता है|

हमारी शादी..

आज उन लोगों को वापस गए तीन हफ्ते हो गए हैं|  जिंदगी पहले जैसी कल रही है पर दोपहर में जब अकेले खाना खाने बैठते हैं तो न चाहते हुए भी आंसू आ जाते हैं| पेट भी नहीं भरता, रात को फिर बच्चों के और वेंकट के साथ खाकर पेट भरता है|


I really miss you papa- mummy!
काश आप हमेशा हमारे पास रह सकते|