•4:56:00 AM
पिछले कुछ दिनों से अपने गर्दन और सीधे हांथ के दर्द की वजह से कुछ भी काम करने में असमर्थ थे। मेरी आठ साल की बेटी हर वक्त हमारी मदद को हाज़िर थी। उसी ने कल एक पुरानी डायरी ला कर दी और पूछा ये आपकी है क्या। हमने उसके हांथो से वो पुरानी यादें लेकर उलटना पुलटना शुरु कर दिया। सबसे पहले नज़र अटक गई एक कविता पर जो हमने उसके(कांती) के जन्म के कुछ दिन बाद ही लिखी थी। सोंचा आज वही कविता अपने ब्लाग पर पोस्ट कर देते हैं।
अभी तो बस तुम
मुझमें ही थीं;
मेरे रोम-रोम में बसी
मेरे अंतर में थी।
ये तुमसे अपनी नज़दीकी
कुछ असह सी होते हुये भी
मुझे बहुत प्रिय थी।
तुम मेरे अंदर
हर पल कसमसाती हुई
अपने होने का अहसास दिलाती थी।
मेरा मन तुम्हारे इंतज़ार में
हज़ारों सपने बुनता था।
सपनों के साथ ही;
सपनों जैसे...
कितने ही मोजों और टोपों ने
भी तो आकार लिये थे।
और अब....
दर्द के एक लम्बे सागर को
पार करने के बाद
तुम मेरी बाहों में हो।
कितनी मासूम!
कितनी कोमल!
जैसे नन्हीं सी कोई
कली हो।
कल अपने तोतले बोलों में
तुम मुझे "मां" कहोगी।
"मां" ये छोटा सा शब्द ही तो
मुझे सम्पूर्ण
और परिभाषित करता है।



अभी तो बस तुम
मुझमें ही थीं;
मेरे रोम-रोम में बसी
मेरे अंतर में थी।
ये तुमसे अपनी नज़दीकी
कुछ असह सी होते हुये भी
मुझे बहुत प्रिय थी।
तुम मेरे अंदर
हर पल कसमसाती हुई
अपने होने का अहसास दिलाती थी।
मेरा मन तुम्हारे इंतज़ार में
हज़ारों सपने बुनता था।
सपनों के साथ ही;
सपनों जैसे...
कितने ही मोजों और टोपों ने
भी तो आकार लिये थे।
और अब....
दर्द के एक लम्बे सागर को
पार करने के बाद
तुम मेरी बाहों में हो।
कितनी मासूम!
कितनी कोमल!
जैसे नन्हीं सी कोई
कली हो।
कल अपने तोतले बोलों में
तुम मुझे "मां" कहोगी।
"मां" ये छोटा सा शब्द ही तो
मुझे सम्पूर्ण
और परिभाषित करता है।










