Author: सारिका सक्सेना
•4:56:00 AM
पिछले कुछ दिनों से अपने गर्दन और सीधे हांथ के दर्द की वजह से कुछ भी काम करने में असमर्थ थे। मेरी आठ साल की बेटी हर वक्त हमारी मदद को हाज़िर थी। उसी ने कल एक पुरानी डायरी ला कर दी और पूछा ये आपकी है क्या। हमने उसके हांथो से वो पुरानी यादें लेकर उलटना पुलटना शुरु कर दिया। सबसे पहले नज़र अटक गई एक कविता पर जो हमने उसके(कांती) के जन्म के कुछ दिन बाद ही लिखी थी। सोंचा आज वही कविता अपने ब्लाग पर पोस्ट कर देते हैं।

अभी तो बस तुम
मुझमें ही थीं;
मेरे रोम-रोम में बसी
मेरे अंतर में थी।
ये तुमसे अपनी नज़दीकी
कुछ असह सी होते हुये भी
मुझे बहुत प्रिय थी।
तुम मेरे अंदर
हर पल कसमसाती हुई
अपने होने का अहसास दिलाती थी।
मेरा मन तुम्हारे इंतज़ार में
हज़ारों सपने बुनता था।
सपनों के साथ ही;
सपनों जैसे...
कितने ही मोजों और टोपों ने
भी तो आकार लिये थे।
और अब....
दर्द के एक लम्बे सागर को
पार करने के बाद
तुम मेरी बाहों में हो।
कितनी मासूम!
कितनी कोमल!
जैसे नन्हीं सी कोई
कली हो।
कल अपने तोतले बोलों में
तुम मुझे "मां" कहोगी।
"मां" ये छोटा सा शब्द ही तो
मुझे सम्पूर्ण
और परिभाषित करता है।



Author: सारिका सक्सेना
•10:24:00 AM


Happy Deepawali




Author: सारिका सक्सेना
•9:56:00 PM

मेरी बारिश
मेरा आकाश
मेरी धूप
कितना कुछ तो है
मेरे पास
मुट्ठी में रेत सा दरकता
मेरा वजूद
मेरी सुबहें
मेरी दुपहरें
इंतज़ार से बोझिल
सुनहरी शामें
और खामोश रात
कितना कुछ तो है
मेरे पास
तेरी सौगात
..
Author: सारिका सक्सेना
•9:55:00 AM

सूरज ने अपनी किरणों की तूलिका को
सुनहरे, नारंगी रंगो में डुबा कर
कुछ ऎसे छुआ कि;
लाज की लाली से अवनि और भी
रुपहली हो गई।

तेरे नाम से जुडा मेरा नाम
कुछ इस तरह कि
हर्फ़ तो थे वही बस
फ़लक और ज़मी की क्षितिज पर
शनासाई हो गई।
Author: सारिका सक्सेना
•2:32:00 AM


वक्त कैसे पंख लगा कर तेजी से उड जाता है पता ही नहीं चलता। अपनी पिछली पोस्ट करीब तीन साल पहले लिखी थी। सोंचो तो लगता है जैसे कल ही की बात है।हमारी नन्ही कली (जिसकी वजह से हमने इस ब्लाग से विराम लिया था) ने प्ले स्कूल जाना शुरु कर दिया है और हमें कुछ वक्त अपने लिये मिलना शुरु हो गया है। पिछले कई दिनों से हिन्दी ब्लाग जगत में आये नये (जो अब नये नहीं रहे) लोगों को और पुराने दिग्गजों को पढने में लगे थे। कुछ पढ पाया है और कुछ अभी बाकी है। हिन्दी ब्लाग जगत सच काफ़ी आगे निकल चुका है। प्रतिभा की कहीं कोई कमी नहीं है। इतना कुछ खूबसूरत पढने को मिल रहा है कि बस डूब कर पढने में वक्त कहां चला जाता है पता ही नहीं चलता। कोशिश करेंगे कि अब जुडे रहें यहां से, और साथ ही कुछ नया लिखे भी।
Author: सारिका सक्सेना
•2:22:00 AM

वरलक्ष्मी [वरम] जन्म : १२ अक्टूबर २००६

"भर गई मेरे हांथों के प्याले में
एक नन्हीं सी मुस्कान
उठे थे हांथ जो दुआ के लिये
वो पा गये वरदान।"