अनकही बातें

बातें जो दिल से निकलीं ...पर ज़ुबां तक न पहुंची ...बस बीच में ही कहीं कलम से होती हुयी पन्नों पर अटक गयीं... यही कुछ है इन अनकही बातों में...

Saturday, June 25

उदासी और कविता

उदासी और मन का जरूर
कविता से कुछ गहरा नाता है;
जहां घिरे कुछ बादल गम के ,
गीत नया बन जाता है!

आंखे हैं या बादल हैं ये;
भेद न इनका हम जानें.
झङी लगी हो जब अश्कों की,
नज़र कहां कुछ आता है।

सांझा दर्द है हम दोनों का
आंखे मेरी, आंसू तेरे;
बहुत प्यार हो जब 'हम-तुम' में
कुछ का कुछ हो जाता है।


P.b. Shelley का एक वाक्य याद आता है:-
Our sweetest songs are those that come from saddest thoughts.

8 Comments:

  • At Sunday, June 26, 2005 1:27:00 PM, Anonymous Anonymous said…

    Khusi ho ya gamm
    Antermane se futti tarang
    Aansuyon kee boondee
    khila deti hansi ke kusum.

     
  • At Sunday, June 26, 2005 1:31:00 PM, Anonymous Anonymous said…

    Khusi ho ya gamm
    Antermane se futti tarang
    Aansuyon kee boondee
    khila deti hansi ke kusum

     
  • At Monday, June 27, 2005 11:36:00 AM, Blogger Dhananjaya Sharma said…

    "वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान"

    यह पंक्तिया आज भी मनस-पटल पर कहीं अंकित थी । आपकी कविता को पढ़ कर पुनः याद आ गयी। पर सर्वप्रथम, आपका स्वागत है, हिन्दी-चिठ्ठाकारी जगत में ।

    जहाँ गद्य के द्वारा, घटनाओं इत्यादि का वर्णन अति विस्तार से किया जा सकता है, वही कविता, चाहे हो उदासी की, या फ़िर हो खुशी की, हमेशा से ही, मनुष्य के ह्रदय से निकलती है और अन्य मनुष्यों के ह्रदय को छू लेती है । आपके गीत को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहा हूँ ।

    यही गीत, जब ह्रदय को छू जाता है,
    तब आँसुओं की बरसात नैनों से करता है ।
    बाद बरसात के, गम के बादल छट जाते है,
    और जीवन में एक नया उजाला आ जाता है ॥


    आपने "अपने परिचय" में लिखा है कि आप अपने अनेक संसारिक रूपों से अलग हट कर, अपने मूल रूप को देखती है । अपने अनेक रूपों व अपने मूल रूप को देखने व जानने की क्षमता एक कवि में ही होती है ।

    इसी संदर्भ में, मेरे द्वारा संकलित एक लेख "वर्त्तमान युग के परिवर्तनशील संसार में भविष्य-सर्जन की कला व विज्ञान" के उपसंहार को यहाँ उल्लेख कर रहा हूँ । पूरा लेख पढ़ने के लिए, मेरे वेब-स्थल लिनक्स में हिन्दी, हिन्दी में लिनक्स पर जाएँ ।

    "अंत में, एक प्रश्न यह भी आता है कि एक मनुष्य की भांति तो हम एक है, परन्तु इस संसार में, हमारे अनेक रूप है । कोई भी पुरूष स्वंय में एक रूप है, वह एक पिता भी है, बह एक पुत्र भी है, वह एक पति भी है, एक भाई भी है, एक कर्मचारी भी है, एक देशवासी भी है और उसके यह सभी रूप अपना-अपना एक इच्छित भविष्य रखते है । यदि कोई अपने इन सभी रूपों के प्रति ईमानदार है तो वह अपनी विभिन्न पहचानों के इच्छित भविष्यों का एक-साथ सर्जन कर सकता है । बल्कि यह स्थिति और भी शोभनीय है, क्योंकि इस अवस्था में, यह सभी भविष्य, उस व्यक्ति के जीवन में एक हीरे के फ़लकों की भांति दिखेगें और चूंकि अतंतः इस सभी रूपों के पीछे एक ही अंतर्मन है, अतः इन सभी भविष्यों की सर्जन क्रिया में बिना किसी विरोधाभासपन को लायें हुए, इनका निर्माण होता जायेगा । "

    आपकी कवितायें, हिन्दी चिठ्ठाकारी जगत को और अधिक सशक्त व जन-मानस तक पहुँचायेगी, ऐसा मेरा विश्वास है ।

    धनञ्जय शर्मा
    २७।६।२००५

     
  • At Thursday, June 30, 2005 6:02:00 AM, Anonymous Anonymous said…

    SONU JI
    AAPKI KAVITAYEN PADIN.
    AAPKI PATRIKA AUR WEWSITE DEKHI AAPKE BARE ME AUR AAPKE VICHAR JANKAR BAHUT ACHCHHA LAGA MERI BADHAI SWEEKAREN.
    KABHI BARAT AAYEN TO BATAYEN.
    MAIN BHI EK ADNA SA RACHNAKAR HUN.
    KUCHH AAP ANUBHUTI AUR MERIWEWSITE
    www.suniljogi.com ME PAD SAKTI HAIN.
    AASHA HAI KI AAPKA UTTAR AWASYA MILEGA.
    PUNAH SHUBKAMNAYEN AUR NAMASKAR SAHIT
    DR. SUNIL JOGI

     
  • At Thursday, June 30, 2005 7:56:00 AM, Blogger अनूप शुक्ला said…

    आंखे हैं या बादल हैं ये;
    भेद न इनका हम जानें.
    झङी लगी हो जब अश्कों की,
    नज़र कहां कुछ आता है।

    ये तो बढ़िया लगीं लाइनें। बधाई!

     
  • At Thursday, June 30, 2005 8:02:00 AM, Blogger sarika saxena said…

    धन्यवाद अनूप जी,
    आपके व्यंग्य लेख की शब्दांजलि पर काफई तारीफें आ रहीं हैं।
    बधाई

     
  • At Monday, July 04, 2005 9:35:00 AM, Blogger Navneet Bakshi said…

    Today while serfing read some similar sentiments about "ankahi batein" and wrote this...
    वो बातें जो कह न सकी तुम
    लेटा रहता था जब आँखें मूँदे
    तुम्हारी झोली में मैं रख कर सर
    वो बातें जो कह न सकी तुम
    जो कहना तो चाहती थी पर
    कुछ शर्मा कर,
    कुछ लज्जा कर किसी बहाने
    टाल दिया करती अक्सर
    वो बातें जो कह न सकी तुम
    रह गई अनकही अधूरी
    अब भी आ-आ कर हवा
    कानों में कह जाती है
    गा उठती हैं दिशाँए
    पत्ते करते हैं सर-सर
    वो तुम्हारे प्रेम के इज़हार का अन्दाज़ था
    जिसे जानते थे तुम सब
    बस इक मैं ही था बे-खबर
    नवनीत बक्शी

     
  • At Saturday, September 02, 2006 6:19:00 AM, Anonymous Anonymous said…

    tujko khoke bhi na khatm hoga tera intjar tamam umra tere dil pe dastak dete reh jayenge.
    dear sarika ji,
    will u plz let me know why the past can not burry itself in peace and stop haunting us

     

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