एक छोटी सी प्रेम कहानी

प्रतीक्षा के पल
होते तो हैं मुश्किल; पर
इन्हीं में छुपी होती है-
आस जीवन की!

समर्पण करूं
खुद को तुम पर;
इससे बढकर और क्या चाहूं!
तुम मेरे बन जाओ तो;
और मैं 'उससे' क्या मांगू?

मिलन के ये दो पल प्रिये!
इंतज़ार था सदी भर का।
खुद को खोकर तुझमें
बनी हूं आज मैं अभिसारिका!

दो मन मिले,
दो तन मिले,
हम बने जीवन रथ के दो पहिये।
'मैं' को खोकर 'हम' ने पाया,
सुख तृप्ति का
परिणति यही तो होनी थी





3 Comments:
At Tuesday, April 04, 2006 1:57:00 PM,
Fakeer said…
"mai" ko kho kar hum ne paya ...prem ki bas yehi paribhasa mujhe samjh aayi hai.
:)
At Tuesday, December 12, 2006 8:24:00 AM,
Manas said…
sarika ji aapka blog dekha maine. achcha hai ji
kripaya mere website www.srijangatha.com ko bhi link de dewen. aapki site ka kya hua ji, Haan, kuch article mere website ke liye bhej den.
jayprakash manas
At Wednesday, January 17, 2007 4:00:00 AM,
Anonymous said…
अच्छा लिखा है....
अपनी एक पुरानी कविता के चार पंतियाँ याद आयीं...
हम कर्म से हैं भाग्या से हैं बंधे हुऐ
तुम रितुराज हुऐ और हुई मैं सारिका
स्नेह वर्षा में तुम्ही की भीग कर
प्रियसी हुई और हुई मैं अभिसारिका
रिपुदमन
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