Monday, November 23, 2009

गुनाहों का देवता : एक अहसास


पढने के शौक के चलते यूं तो ये उपन्यास पहले शायद 9th में पढा था, मगर कुछ भी याद नहीं था। पिछले दिनों बैंगलौर बुक फेयर में हिन्दी के इक्लौते स्टाल पर जब गुनाहों का देवता दिखाई दिया तो सोंचा इसे भी अपने पुस्तकों के संकलन में शामिल कर लें।
इतवार को कुछ वक्त मिला तो सोंचा इसे पढना शुरु कर देते हैं। आराम से कम से कम एक हफ्ते में पढ जायेगा। पर पढना शुरु करने के बाद अपने आप को रोकना मुश्किल था। कल शाम को इसे खत्म करने के बाद मन एक अजीब सी उदासी से घिरा हुआ है। एक अजीब सा भारीपन है जिसे समझना मुश्किल सा लग रहा है। सोंचा था बहुत कुछ लिखेंगे, पर मन अभी भी उन पात्रों के बीच भटका हुआ है। जिन्होंने भी गुनाहों का देवता पढा है, वो मेरी हालत समझ पा रहे होंगे।
वैसे देखा जाय तो ये एक सीधी सी कहानी है, पर भावनाओं से एकदूसरे से बंधे सभी पात्र और कहानी विलक्षण हैं। कभी ये पात्र अपने बीच के से लगते हैं तो कभी किसी दूसरी दुनिया के से। सुधा और चंदर मुख्य पात्र हैं बहुत ज्यादा प्रभावित करते हैं। वे एकदूसरे से इतना प्यार करते हैं कि उसकी पराकाष्टा बलिदान और त्याग में होती है। वे एक ओर महान हैं तो दूसरी ओर उनमें मनुष्यगत कम्जोरियां भी हैं, इन्हें वे स्वीकार भी करते हैं । पर हमारा पसंदीदा चरित्र बिनती का है। जो एक साधारण और व्यवहारिक लडकी है। उसके चरित्र में आरम्भ से अंत तक जो परिवर्तन दिखाया गया है, वो आशा की ओर ले जाता है।
आधा उपन्यास पढने के बाद ही पता नहीं क्यों अहसास हो गया था कि सुधा को तो जाना ही है। और जो उपसंहार है , लगता है इससे बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता था।
शायद कुछ दिन बाद, या कुछ साल बाद इसे दोबारा पढेंगे, तब शायद कुछ और गहराई से समझ पायेंगे।
किताब का आखरी अंश बहुत ही सुंदर है;

.....चीख से चन्दर जैसे होश में आ गया। थोडी देर चुपचाप रहा फिर झुककर अंजलि में पानी लेकर मुंह धोया और बिनती के आंचल से पोंछकर बहुत मधुर स्वर में बोला-"बिनती, रोओ मत! मेरी समझ में कुछ नहीं आता कुछ भी! रोओ मत!" चन्दर का गला भर आया और आंसू छलक आये-"चुप हो जाओ रानी!मैं अब इस तरह कभी नहीं करूंगा-उठो! अब हम दोनों को निभाना है, बिनती!" चन्दर ने तख्त पर छीना छपटी में बिख्ररी हुई राख चुटकी में उठाई और बिनती की मांग में भरकर मांग चूम ली। उसके होंठ राख से सन गये।
सितारे टूट चुके थे। तूफान खत्म हो चुका था।
नाव किनारे पर आकर लग गई थी-मल्लाह को चुपचाप रुपये देकर बिनती का हांथ थामकर चन्दर ठोस धरती पर उतर पडा....'मुरदा चांदनी में दो छायाएं मिलती-जुलती हुई चल दीं।
गंगा की लहरों मे बनता हुआ राख का सांप टूट फूट कर बिखर चुका थाऔर नदी फिर उसी तरह बहने लगी थी जैसे कभी कुछ हुआ ही न हो।

12 comments:

सागर said...

सुबह से दो जगह इसका ज़िक्र कर चुका हूँ... और क्या संयोग है कि बार - बार यही नज़र के सामने घूम रह है...

सागर said...

और फिकर नहीं यह उदासी मुझे महिना और मेरे दोस्त को हफ्ते भर रहा था... आपका तो १-२ दिन ही हुआ है...

सागर said...

इसे पढ़कर सात साल बाद भी मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं...

श्रीश पाठक 'प्रखर' said...

एक विनम्र अनवरत निश्छल सी प्रार्थना सी है..गुनाहों का देवता की बुनावट...इसकी पंक्तियाँ..सिर्फ रूह से ताल्लुक रखती हैं..!!!

श्रीश पाठक 'प्रखर' said...

और हाँ; सागर साहब के तीनों कॉमेंट्स काश की मेरे होते..!!!

डॉ.पदमजा शर्मा said...

सारिका जी
जो रचना अपने रचे जाने के बाद लंबे काल खंड तक आपको पसंद आती है , प्रभावित करती है .याद रहती है .आप उसे पढ़ने को आतुर रहते हैं , बड़ी रचना होती है.
आप मेरी दोस्त बनीं ,बहुत बहुत शुक्रिया.

शहरोज़ said...

पिछले साल तक नियमित रहा , अब पुनः अंतर्जाल पर उपस्थित हुआ हूँ.लेकिन अफ़सोस आपकी तरफ आना न हुआ.जब आया तो बस जाने का मन न करता है.बहुत ही व्यवस्थित लेखन है आपका..यही दुआ है, जोर-ए-कलम और ज्यादा! कभी मौक़ा मिले तो खाकसार के ठिकाने पर भी आयें, हौसला अफजाई होगी.

अर्कजेश said...

बहुत पहले पढा था इसे । कालेज के दिनों में । कुछ लोग तो इसे पढते पढते फूट फूट कर रोने लगते थे । खासकर उस उम्र में तो यह सम्‍मोहक होता था ।

NUKTAA said...

बहुत ही सुन्दर रचना रही हैं गुनाहों का देवता डॉ. धरमवीर भारती की. मेरी सबसे पसंदीदा पुस्तकों में से एक. आपकी विवंचना पढ़कर अच्छा लगा. अगर आपने इस पुस्तक को पसंद किया है. तो आपने कनुप्रिया जरुर पढ़ी होगी, इस काव्यमय राधा की मनोव्यथा को अवश्य पढ़ें

Apanatva said...

maine ue upanyas pachas saal pahile pada tha par aaj bhee sudha chander dimag par chae hue hai..........

सतीश पंचम said...

आपने गुनाहों का देवता के जिस अंश का जिक्र किया है उसी अंश को आज गिरिजेश जी के पोस्ट पर मैंने भी जिक्र किया है।

मुझे भी गुनाहों का देवता बहुत बढ़िया लगी है। पढ़ने के बाद मन भारी सा लगता है। यही हाल राजेन्द्र यादव रचित सारा आकाश पढ़ने के बाद होती है।

राजेश उत्‍साही said...

यह भी संयोग ही है कि यह मेरा भी बहुत प्रिय उपन्‍यास है। शायद आपको पता होगा कि इस पर भी एक फिल्‍म बनी है जिसमें अभिताभ बच्‍चन और जया भादुड़ी ने अभिनय किया है। नाम है एक था चंदर,एक थी सुधा। हालांकि फिल्‍म बहुत सफल नहीं रही।