यादें बचपन की.....
आज ऎसे ही सोंचा कि अपने बचपन को याद किया जाय। रोज़ ही सोंचते रहते हैं कुछ लिखने के लिये पर वक्त नहीं निकाल पाते, यूं लिखने को तो बहुत कुछ है। जब लिखना शुरु कर दिया है तो बचपन से खूबसूरत और क्या होगा। वैसे पुराने दिनों की याद करने बैठो तो ज्यादा कुछ याद नहीं आता, बस कुछ धुंधली, कुछ स्पष्ट थोड़ी सी यादें है। हमारी याददाश्त ज्यादा तेज नहीं है, कुछ विशेष बातें ही याद रह जाती हैं।
हमारा पहला स्कूल था भारती मान्टेसरी स्कूल! हमें याद है हम जब मम्मी के साथ वहां एड्मीशन लेने गये थे। बहुत ही ज्यादा उत्साहित थे हम स्कूल जाने के लिये। पर अगले ही दिन जब बिना मम्मी के अकेले स्कूल जाना पड़ा तो रोना शुरु हो गया था। ऎसे ही बस स्कूल जाते जाते स्कूल अच्छा लगने लगा। और जब पढना सीखा तो एकदम ही किताबी कीड़े बन गये। हर वक्त कुछ न कुछ पढते रहना हमारा प्रिय शौक बन गया। और जब हम कुछ रोचक पढ रहे होते थे तो हमें आस पास के बारे में कुछ पता नहीं होता था और न ही कुछ सुनाई पड़ता था। उन्हीं दिनों की एक घटना जब हम तीसरी क्लास में पढते थे , अब भी याद है, उसका निशान मन के साथ हांथ पर अब भी है। हुआ यूं कि हम क्लास में बैठे कोई किताब बहुत तल्लीनता से पढ रहे थे। हमारी एक सह्पाठी दीपशिखा (नाम अब भी याद है) ने अपनी पेंसिल ब्लेड से बहुत ही अच्छे से छीली। पेंसिल की नोक बहुत नुकीली और बड़ी हो गई थी और दीपशिखा हमें ये दिखाना चाहती थी, हमने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया,जब उसने कई बार टोंका तो हमने उसकी पेंसिल तोड़ दी। उसे इस पर इतना गुस्सा आया कि उसने ब्लेड हमारे हांथ पर चला दिया। इतना खून निकला कि आस पास के सब लोग डर गये, पर हमने टीचर से शिकायत नहीं की क्योंकि हमें पता था कि गलती हमारी भी है। हालांकि बाद में टीचर को पता चल गया और परिणाम स्वरूप सभी के ब्लेड जब्त कर लिये गये। चौथी क्लास तक हम उस स्कूल में पढे। उसके बाद पिताश्री ने हमारा नाम इंग्लिश मीडीयम से सीधे संस्कृत मीडीयम, यानी की सरस्वती शिशु मन्दिर में करा दिया।
सरस्वती शिशु मन्दिर की कुछ बहुत प्यारी यादें अब भी जहन में हैं। वहां का माहौल हमारे पिछले स्कूल से बिल्कुल अलग था, जिससे शुरु शुरु में थोड़ी परेशानी हुई पर बाद में हम माहौल के मुताबिक ढल गये। शिशु मन्दिर में प्रतिदिन की शुरुवात प्रार्थना, एक समारोह की तरह होती थी। सुबह पूरे एक घन्टा मैदान में बैठना होता था। प्रातःस्मरण से शुरुवात होकर गीता के श्लोक, रामायण की चौपाईयां, विभिन्न गीत और सरस्वती वन्दना और भी न जाने क्या क्या होता था। हम वन्दना प्रमुख थे और सुबह की प्रार्थना सुचारु रूप से कराना हमारा काम था। उन्ही दिनों कविताओं से पहली पहचान हुई। हम लोगों को प्रतिदिन प्रार्थना के समय एक गीत भी गवाया जाता था। उनमें से दो कवितायें अभी भी याद हैं-
उगा सूर्य कैसा कहो मुक्ति का ये,
उजाला करोड़ो घरों में न पहुंचा।
खुला पिंजरा है मगर रक्त अब भी,
थके पंछियों के परों में न पहुंचा।
और
जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाय।
हमारे एक आचार्य जी (शिशु मन्दिर में टीचर को आचार्य कहकर बुलाते हैं) थे, जिनका नाम था दिनेश चन्द्र अग्निहोत्री। वो कविता लिखा करते थे और हम लोगों को सुनाया करते थे। तब समझ में कुछ ज्यादा नहीं आता था। पर अच्छा लगता था उन्हें सुनना।
उन्हीं दिनों विद्यालय के वार्षिकोत्सव का आयोजन हुआ। जिसमें विभिन्न कार्यक्रमों में हमने बढ-चढ कर हिस्सा लिया। यहां दिनेश आचार्य जी ने एक कवि सम्मेलन का भी आयोजन कराया। जिसमें हमें महादेवी वर्मा का किरदार मिला। तब पता नहीं था कि महादेवी वर्मा कितनी बड़ी कवियत्री हैं, बस अच्छा लगता था कि हमें इतना महत्वपूर्ण रोल मिला है। तभी महादेवी जी की पहली कविता पढी जो हमें स्टेज पर सुनानी थी-
वे मुस्काते फूल नहीं
जिनको आता है मुरझाना।
वे तारों के दीप नहीं,
जिनको भाता है बुझ जाना.....
और ये अब भी हमारी पसंदीदा कविता है।
महादेवी वर्मा का रोल करने से एक बात और ये हुई की हमने कविता करना शुरु कर दिया। घर में और स्कूल में सब हमें कवियत्री कहकर चिढाते थे। और हम चिढते भी बहुत थे। पता नहीं क्यों ऎसा लगा कि हमें कविता करनी चाहिये। दो अक्टूबर आने वाली थी तो सोंचा गांधी जी के ऊपर कविता लिखना अच्छा रहेगा। और अपनी पहली कविता की कुछ पंक्तियां अब भी याद हैं-
भारत की जनता को बापू जी ने संदेश दिया
पढो लिखो और चरखा कातो यही है हमको लक्ष्य दिया।
पर भारत की जनता ने इस सबको क्या अंजाम दिया,
फैली चारों ओर अव्यवस्था आतंक का बोलबाला है,
जनता नही सुधर पाई है चरखे को अब छोड़ दिया।
और भी काफी लम्बी कविता थी पर अब याद नहीं। अब इसे याद करके हंसी आती है। पर उन दिनों बहुत गर्व होता था कि हमने कविता लिखी है। इसे बार बार पढा करते थे। उन्ही दिनों हमारे यहां बुन्देल्खन्ड विश्ववविद्यालय के वाइस चांसलर डा. बी.बी.लाल आये। पापा ने उन्हें बता दिया कि हम कविता लिखते हैं। तो उन्होंने हमारी क्लास ले ली। बोले अपनी कोई कविता दिखाओ। हमने उसी दिन इन्द्र धनुष को देखकर एक कविता लिखी थी -
सत्ताइस तारीख की शाम मेरे मन में आज भी है
जब निकला था इन्द्रधनुष आसमान में...
उन्होंने इस कविता को पढकर हमें ढेर सारे उपदेश दे डाले, कि कविता लिखना है तो अभी से सीखना होगा, कविता में लय होनी चाहिये, वगैरह वगैरह...। पता नहीं क्यों हमें उनके उपदेश अच्छे नहीं लगे और हमने कविता लिखना कुछ सालों के लिये स्थगित कर दिया। आखिर हम पांचवी क्लास में थे और भी बहुत काम थे करने को।
शिशु मन्दिर में ही एक और गीत सीखा जिसे हमारे हिसाब से राष्ट्र गान की संज्ञा मिलनी चाहिये। इसे याद करने की कोशिश कर रहे हैं पर ठीक से याद नहीं आ रहा।
आप लोगों में से किसी को याद हो तो बताइये।
सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।
हम बुलबुलें हैं इसकी ये गुलसितां हमारा।
मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।
हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा।
गोदी में खेलती हैं जिसकी हजारों नदियां।
गुलशन है जिसके दम से ----।
पर्वत वो सबसे ऊंचा हम साया आसमां का,
---
ये गीत शायद इकबाल का है। हमें ठीक से नहीं पता। आपको पता हो तो बतायें।
हमारा पहला स्कूल था भारती मान्टेसरी स्कूल! हमें याद है हम जब मम्मी के साथ वहां एड्मीशन लेने गये थे। बहुत ही ज्यादा उत्साहित थे हम स्कूल जाने के लिये। पर अगले ही दिन जब बिना मम्मी के अकेले स्कूल जाना पड़ा तो रोना शुरु हो गया था। ऎसे ही बस स्कूल जाते जाते स्कूल अच्छा लगने लगा। और जब पढना सीखा तो एकदम ही किताबी कीड़े बन गये। हर वक्त कुछ न कुछ पढते रहना हमारा प्रिय शौक बन गया। और जब हम कुछ रोचक पढ रहे होते थे तो हमें आस पास के बारे में कुछ पता नहीं होता था और न ही कुछ सुनाई पड़ता था। उन्हीं दिनों की एक घटना जब हम तीसरी क्लास में पढते थे , अब भी याद है, उसका निशान मन के साथ हांथ पर अब भी है। हुआ यूं कि हम क्लास में बैठे कोई किताब बहुत तल्लीनता से पढ रहे थे। हमारी एक सह्पाठी दीपशिखा (नाम अब भी याद है) ने अपनी पेंसिल ब्लेड से बहुत ही अच्छे से छीली। पेंसिल की नोक बहुत नुकीली और बड़ी हो गई थी और दीपशिखा हमें ये दिखाना चाहती थी, हमने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया,जब उसने कई बार टोंका तो हमने उसकी पेंसिल तोड़ दी। उसे इस पर इतना गुस्सा आया कि उसने ब्लेड हमारे हांथ पर चला दिया। इतना खून निकला कि आस पास के सब लोग डर गये, पर हमने टीचर से शिकायत नहीं की क्योंकि हमें पता था कि गलती हमारी भी है। हालांकि बाद में टीचर को पता चल गया और परिणाम स्वरूप सभी के ब्लेड जब्त कर लिये गये। चौथी क्लास तक हम उस स्कूल में पढे। उसके बाद पिताश्री ने हमारा नाम इंग्लिश मीडीयम से सीधे संस्कृत मीडीयम, यानी की सरस्वती शिशु मन्दिर में करा दिया।
सरस्वती शिशु मन्दिर की कुछ बहुत प्यारी यादें अब भी जहन में हैं। वहां का माहौल हमारे पिछले स्कूल से बिल्कुल अलग था, जिससे शुरु शुरु में थोड़ी परेशानी हुई पर बाद में हम माहौल के मुताबिक ढल गये। शिशु मन्दिर में प्रतिदिन की शुरुवात प्रार्थना, एक समारोह की तरह होती थी। सुबह पूरे एक घन्टा मैदान में बैठना होता था। प्रातःस्मरण से शुरुवात होकर गीता के श्लोक, रामायण की चौपाईयां, विभिन्न गीत और सरस्वती वन्दना और भी न जाने क्या क्या होता था। हम वन्दना प्रमुख थे और सुबह की प्रार्थना सुचारु रूप से कराना हमारा काम था। उन्ही दिनों कविताओं से पहली पहचान हुई। हम लोगों को प्रतिदिन प्रार्थना के समय एक गीत भी गवाया जाता था। उनमें से दो कवितायें अभी भी याद हैं-
उगा सूर्य कैसा कहो मुक्ति का ये,
उजाला करोड़ो घरों में न पहुंचा।
खुला पिंजरा है मगर रक्त अब भी,
थके पंछियों के परों में न पहुंचा।
और
जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाय।
हमारे एक आचार्य जी (शिशु मन्दिर में टीचर को आचार्य कहकर बुलाते हैं) थे, जिनका नाम था दिनेश चन्द्र अग्निहोत्री। वो कविता लिखा करते थे और हम लोगों को सुनाया करते थे। तब समझ में कुछ ज्यादा नहीं आता था। पर अच्छा लगता था उन्हें सुनना।
उन्हीं दिनों विद्यालय के वार्षिकोत्सव का आयोजन हुआ। जिसमें विभिन्न कार्यक्रमों में हमने बढ-चढ कर हिस्सा लिया। यहां दिनेश आचार्य जी ने एक कवि सम्मेलन का भी आयोजन कराया। जिसमें हमें महादेवी वर्मा का किरदार मिला। तब पता नहीं था कि महादेवी वर्मा कितनी बड़ी कवियत्री हैं, बस अच्छा लगता था कि हमें इतना महत्वपूर्ण रोल मिला है। तभी महादेवी जी की पहली कविता पढी जो हमें स्टेज पर सुनानी थी-
वे मुस्काते फूल नहीं
जिनको आता है मुरझाना।
वे तारों के दीप नहीं,
जिनको भाता है बुझ जाना.....
और ये अब भी हमारी पसंदीदा कविता है।
महादेवी वर्मा का रोल करने से एक बात और ये हुई की हमने कविता करना शुरु कर दिया। घर में और स्कूल में सब हमें कवियत्री कहकर चिढाते थे। और हम चिढते भी बहुत थे। पता नहीं क्यों ऎसा लगा कि हमें कविता करनी चाहिये। दो अक्टूबर आने वाली थी तो सोंचा गांधी जी के ऊपर कविता लिखना अच्छा रहेगा। और अपनी पहली कविता की कुछ पंक्तियां अब भी याद हैं-
भारत की जनता को बापू जी ने संदेश दिया
पढो लिखो और चरखा कातो यही है हमको लक्ष्य दिया।
पर भारत की जनता ने इस सबको क्या अंजाम दिया,
फैली चारों ओर अव्यवस्था आतंक का बोलबाला है,
जनता नही सुधर पाई है चरखे को अब छोड़ दिया।
और भी काफी लम्बी कविता थी पर अब याद नहीं। अब इसे याद करके हंसी आती है। पर उन दिनों बहुत गर्व होता था कि हमने कविता लिखी है। इसे बार बार पढा करते थे। उन्ही दिनों हमारे यहां बुन्देल्खन्ड विश्ववविद्यालय के वाइस चांसलर डा. बी.बी.लाल आये। पापा ने उन्हें बता दिया कि हम कविता लिखते हैं। तो उन्होंने हमारी क्लास ले ली। बोले अपनी कोई कविता दिखाओ। हमने उसी दिन इन्द्र धनुष को देखकर एक कविता लिखी थी -
सत्ताइस तारीख की शाम मेरे मन में आज भी है
जब निकला था इन्द्रधनुष आसमान में...
उन्होंने इस कविता को पढकर हमें ढेर सारे उपदेश दे डाले, कि कविता लिखना है तो अभी से सीखना होगा, कविता में लय होनी चाहिये, वगैरह वगैरह...। पता नहीं क्यों हमें उनके उपदेश अच्छे नहीं लगे और हमने कविता लिखना कुछ सालों के लिये स्थगित कर दिया। आखिर हम पांचवी क्लास में थे और भी बहुत काम थे करने को।
शिशु मन्दिर में ही एक और गीत सीखा जिसे हमारे हिसाब से राष्ट्र गान की संज्ञा मिलनी चाहिये। इसे याद करने की कोशिश कर रहे हैं पर ठीक से याद नहीं आ रहा।
आप लोगों में से किसी को याद हो तो बताइये।
सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।
हम बुलबुलें हैं इसकी ये गुलसितां हमारा।
मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।
हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा।
गोदी में खेलती हैं जिसकी हजारों नदियां।
गुलशन है जिसके दम से ----।
पर्वत वो सबसे ऊंचा हम साया आसमां का,
---
ये गीत शायद इकबाल का है। हमें ठीक से नहीं पता। आपको पता हो तो बतायें।





8 Comments:
At Friday, November 18, 2005 10:42:00 AM,
Jitendra Chaudhary said…
बहुत सुन्दर लिखा है, अच्छा लगा।
ये गीत अलामा इकबाल का ही है, जो बँटवारे में पाकिस्तान चले गये थे। उन्होने काफ़ी कुछ लिखा था। लेकिन इसको सबसे ज्यादा प्रशंसा और शोहरत मिली।
At Friday, November 18, 2005 11:03:00 AM,
अनूप शुक्ला said…
खूबसूरत।गद्य लेखन की शुरुआत बहुत अच्छा कदम है।महादेवी वर्माजी की कुछ कवितायें मुझे बहुत पसन्द हैं।एक है:-
बांध लेंगे क्या तुझे
ये मोम के बंधन सजीले?
पंथ की बाधा बनेंगे
तितलियों के पर रंगीले?
तू न अपनी छांह को
अपने लिये कारा बनाना
जाग तुझको दूर जाना।
और यादें समेटिये गद्य में। हम उत्सुक हैं पढ़ने के लिये।
At Friday, November 18, 2005 8:11:00 PM,
Manoshi Chatterjee said…
ये गीत ऐसा है कुछ...
सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।
हम बुलबुलें हैं इसकी ये गुलसितां हमारा।।
पर्वत वो सबसे ऊंचा हम साया आसमां का।
वो संतरी हमारा, वो पासवां हमारा॥
गोदी में खेलती हैं जिसकी हजारों नदियां।
गुलशन है जिसके दम से वो रस्के जिना हमारा॥
मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।
हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा॥
सारिका आपके लेख से बचपन में स्कूल में गाये जाने वाले प्रार्थना गीत हमें भी याद आ गये। जो भी केन्द्रीय विद्यालय में पढा होगा उसे ये याद होगा,
"दया कर दान न विद्या का हमें परमात्मा देना
दया करना हमारी आत्मा में शुद्धता देना..."
At Friday, November 18, 2005 11:58:00 PM,
Manoshi Chatterjee said…
कृपया ऊपर टिप्पणी में प्रार्थना गीत को इस तरह पढें...
"दया कर दान विद्या का हमें परमात्मा देना
दया करना हमारी आत्मा में शुद्धता देना..."
typo ने सारा अर्थ ही बदल दिया था।
At Saturday, November 19, 2005 12:28:00 AM,
आशीष श्रीवास्तव said…
ये गीत इकबाल का ही है, जो पाकिस्तान के प्रणेता थे।
इकबाल , ये नाम है एक महान विचारक ,एक महान शायर का.
अपने जिवन के पुर्वाध मे केब्रीज जाने से पहले १९०५ तक इकबाल के लेखन मे राष्ट्रीयता और सांप्रदायीक सदभाव का एक प्रवाह था. अपनी पीढी से अलग वे भारतीय संस्कृती,धर्म और इतिहास से भलीभांती परिचीत थे. उनकी कविताए उनकी एक सच्चे भारतीय के विशाल हृदय को व्यक्त करती हैं. उनकी कविताओ मे हिन्दु भगवान,सिख गुरूओं , पवित्र नदियों, पर्वतो और भारतीय भूमी का कुशल चित्रण है. हिन्दु , मुस्लीम और सिख परंपराओ पर कविताए लिख कर इक्बाल एक संपुर्ण भारतीय कवी के रूप मे उभर कर आये. १९०४ मे तरन्नुम ए हिन्द मे उन्होने लीखा
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ता हमारा
हम बुलबुले हैं उसकी वो गुलसितां हमारा
मजहब नही सिखाता आपस मे बैर रखना
हिन्दी है हम वतन है हिन्दोस्ता हमारा
'राम' को इकबाल ने 'इमाम ए हिन्द' कहा
फिर है राम के वजूद पर हिन्दोस्ता को नाज
अहले नजर समझते है उसको इमाम ए हिन्द
ये वही इकबाल है जिसने "नया शिवाला" मे लीखा
शक्ति भी शान्ती भी भगवान के गीत मे है
धरती वासीयों की मुक्ती प्रीत मे है.
इसी कविता मे आगे उन्होने लिखा
खाक ए वतन का हर जर्रा मुझको देवता है.
अपनी युरोप यात्रा के बाद (१९०८) इकबाल एक बदले हुवे इन्सान थे. उनकी निगाहे बदल चुकी थी. भारत माता एक सपुत को खो चुकी थी. अब इकबाल सिर्फ इस्लाम के दुत(शायर ए इस्लाम्) बन चुके थे. इकबाल ने "सारे जहाँ से अच्छा" को नादानी मे लिखी रचना करार दिया और लिखा
चीन और अरब हमारा, हिन्दोस्ता हमारा
मुस्लिम है हम वतन है सारा जहाँ हमारा
तेगो के साये मे पलकर हम जवान हुवे हैं
खन्जर हलाल का है कौमी नशा हमारा
अन्त मे इसी इक्बाल ने १९३० मे मुस्लिम राष्ट्रवाद के नाम पर पाकिस्तान के विषैले बिज बोये, जिसकी फसल हम आज तक काट रहे हैं.
At Saturday, November 19, 2005 12:04:00 PM,
Sunil Deepak said…
वाह सारिका जी आप के बचपन की यादों के बारे में पढ़ कर बहुत अच्छा लगा. करीब दस या पंद्रह साल पहले तक मेरी मौसी दिल्ली में सरस्वति शिशु मन्दिर में पढ़ाती थीं इसलिए जाना पहचाना नाम पढ़ कर की अच्छा लगा. उसके बाद क्या हुआ, इसको जानने की उत्सुक्ता रहेगी. सुनील
At Monday, November 21, 2005 8:24:00 PM,
sarika saxena said…
आप सभी लोगों का धन्यवाद हमारा उत्साह बढाने के लिये।
विशेषतः आशीष जी आपका धन्यवाद इकबाल के बारे में ये जानकारी देने के लिये।
At Wednesday, February 08, 2006 11:59:00 AM,
masijeevi said…
इंटरनेट भी गजब चीज है एक ही पेज पर इकबाल विषैले बीज बोने बाले और 'सरस्वती शिशु मंदिर' स्वीकार्य ???
खैर आपका गद्य रोचक है।
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