कुछ हायकू मेरे भी
आजकल हायकू का मौसम सा आया हुआ है। सभी हायकू में अपने आपको अभिव्यक्त कर रहे हैं।
हमारा भी यह पहला प्रयास है हायकू लेखन में;
हुई बावरी
जब तुम मिले तो
खिला है मन
कच्चे धागे से
प्रीत के बन्धन ये
कितने पक्के
छिपे हो कहां
ढूंढू तुम्हें हर सू
अंखिया मीचे
देखूं अब क्या
बस गई मन में
तस्वीर तेरी
तेरी लगन
राधा सी प्रीत मेरी
कान्हा तुम हो
दहके गाल
रंग हुआ चम्पई
एक नज़र
तुम आ जाओ
लगता नहीं दिल
कैसे कहें ये
कहां मिलेगा
धरती अम्बर सा
साथ हमारा
तुमने छुआ
अंखिया झुक गई
छुई मुई सी
मन बसंती
गाने लगा मल्हार
बादल छाये
रतियां सूनी
तुम गये जबसे
दिन बिराना
हमारा भी यह पहला प्रयास है हायकू लेखन में;
हुई बावरी
जब तुम मिले तो
खिला है मन
कच्चे धागे से
प्रीत के बन्धन ये
कितने पक्के
छिपे हो कहां
ढूंढू तुम्हें हर सू
अंखिया मीचे
देखूं अब क्या
बस गई मन में
तस्वीर तेरी
तेरी लगन
राधा सी प्रीत मेरी
कान्हा तुम हो
दहके गाल
रंग हुआ चम्पई
एक नज़र
तुम आ जाओ
लगता नहीं दिल
कैसे कहें ये
कहां मिलेगा
धरती अम्बर सा
साथ हमारा
तुमने छुआ
अंखिया झुक गई
छुई मुई सी
मन बसंती
गाने लगा मल्हार
बादल छाये
रतियां सूनी
तुम गये जबसे
दिन बिराना





11 Comments:
At Monday, December 05, 2005 1:43:00 AM,
अनूप शुक्ला said…
वाह पहले प्रयास में ही इतने सुंदर हायकू!
At Monday, December 05, 2005 3:52:00 AM,
Pratik said…
बहुत खूब। आपके हायकू पढ़के अच्छा लगा। आपकी रचनाओं में काव्य की गहरी समझ प्रदर्शित होती है।
At Monday, December 05, 2005 10:41:00 AM,
Manoshi Chatterjee said…
vaah acche hain haiku.
At Monday, December 05, 2005 11:28:00 AM,
अनूप भार्गव said…
कोमल अनुभूति लिये ये हायकु बहुत अच्छे लगे
At Monday, December 05, 2005 12:17:00 PM,
sarika saxena said…
हमारा उत्साह बढाने के लिये आप सभी का धन्यवाद!
सारिका
At Thursday, December 15, 2005 1:35:00 PM,
Anshul said…
Sarika,
As always, this was excellent too.
At Sunday, December 18, 2005 1:01:00 AM,
masijeevi said…
हायकू नए
बहुत खूब कहे
जारी रहिए
At Sunday, December 18, 2005 1:01:00 AM,
masijeevi said…
हायकू नए
बहुत खूब कहे
जारी रहिए
At Wednesday, January 11, 2006 7:35:00 AM,
Sachin Suryawanshi said…
Bahut hee badhiya hai...
Keep writing,
At Tuesday, January 31, 2006 1:48:00 PM,
Tarun said…
Achha likha hai saarika, kisi din mai bhi try karoonga, aaj ke liye trailor hai -
khana khaya
pet bhar gaya
Achha tha
(lunch time hai yehi likh sakta hoon) tab tak tum haayku likhti reho.
At Thursday, July 13, 2006 12:28:00 PM,
Nidhi said…
अपने चिट्ठे पर की गयी आपकी टिप्पणी के ज़रिये यहाँ तक पहुँची । बहुत सुंदर कविता लिखती हैं आप सारिका जी । पुनः लेखन शीघ्र आरंभ करियेगा ।
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