Author: सारिका सक्सेना
•10:33:00 AM


पिछले कई दिन से सोंच रहे हैं कि इस बार अनुगूंज पर हम भी अपनी पोस्ट लिख ही दें, पर वक्त ही नहीं मिल पा रहा था। आज शब्दांजलि का दिसम्बर अंक प्रकाशित करके फुरसत हुये तो सोंचा इस काम को आज कर ही दें। हर माह शब्दांजलि के प्रकाशन के बाद बहुत हल्का-हल्का सा महसूस होता है। एक बड़ी जिम्मेदारी सी पूरी हो जाती है।
हां तो बात हो रही थी अनुगूंज की, जिसका कि इस बार शीर्षक है - "हम फिल्में क्यों देखते हैं"
फिल्में तो सभी देखते हैं- कोई सोंच समझ कर कोई बिना सोंचे समझे। वैसे कहा जाता है कि फिल्में समाज का आईना होती हैं। पर शायद हमारे हिसाब से फिल्में सपनों का आईनां होती हैं। आम ज़िन्दगी में जो कुछ हमें हासिल नहीं होता, वो हम फिल्मों में देख कर खुश हो लेते हैं।
लेकिन आजकल हिन्दी फिल्मों का रुख पता नहीं किस ओर जा रहा है। कम ही फिल्में देखने लायक रह गई हैं। हमें ये कहते हुये थोड़ा संकोच हो रहा है कि हम हिन्दी फिल्मों से ज्यादा अंग्रेजी फिल्में देखते हैं। अंग्रेजी फिल्मों में विविधता होती है, आप अपनी पसंद और रुचि के अनुरूप फिल्म चुन सकते हैं।
फिर भी कुछ पुरानी हिन्दी फिल्मों की बात अलग थी। हमारी पहली मूवी थियेटर में "क्रान्ति" थी जो पापा ने हमे हाइस्कूल में फर्स्ट डिवीज़न आने पर दिखाई थी। उसके बाद से थियेटर में बस गिनी चुनी मूवीज़ ही देखीं। ज्यादातर टीवी पर दिखाई जाने वाली फिल्में ही देखते हैं। अब क्यों देखते हैं, इसके कई कारण हैं। कई बार कुछ करने को नहीं होता, तो फिल्म देख लेते हैं। कई बार कुछ करने का मन नहीं होता तो फिल्म देखते हैं। हर बार एक फिल्म देख कर सोंचते हैं बेकार देखी, इससे अच्छा तो कोई किताब पढ लेते। पर अगली बार फिर कोई फिल्म देखने बैठ जाते हैं।
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1 comments:

On Saturday, December 03, 2005 1:22:00 PM , अनूप शुक्ला said...

अनुगूंज की पहली प्रस्तुति की बधाई। आगे भी लिखती रहें।