अनकही बातें

बातें जो दिल से निकलीं ...पर ज़ुबां तक न पहुंची ...बस बीच में ही कहीं कलम से होती हुयी पन्नों पर अटक गयीं... यही कुछ है इन अनकही बातों में...

Wednesday, November 30

ख्वाब

कुछ न कहो बस ख्वाब का क्या है
ख्वाब सुनहरे होते हैं।
कितने सारे पागल प्रेमी,
मिल के इन्हें सजोंते हैं।

कांच के नाजुक ताजमहल से ,
रखना इन्हें सम्भल के तुम;
एक ठेस भी गर लग जाय
किरचें दिल में चुभोते हैं।

किसी को मंज़िल तक पहुंचायें
किसी के राह में बिखर गये,
कहीं-कहीं पर धूमिल-धूमिल
कहीं रुपहले होते हैं।

ख्वाब हैं आखिर टूट जायं तो,
नये ख्वाब तुम बुन लेना;
माला गर टूट जाय तो
मोती नये पिरोते हैं।

1 Comments:

  • At Wednesday, November 30, 2005 11:10:00 PM, Blogger Pratyaksha said…

    हर दिन हर पल
    बडे जतन से
    सींच सींच कर
    प्यार लगन से
    हमने भी कुछ
    बोये सपने
    जाने कब वो
    पेड उगेगा
    कब सपनों का
    फूल झडेगा

     

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