Author: सारिका सक्सेना
•6:03:00 PM
रोज वही सूरज का ढलना,
नैनों में दीपक का जलना,
सदियों सी इक शाम बिताकर;
रात गये फिर उनसे मिलना।

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राह देखते तेरी,
खुद राह हो गये तेरी,
इस राह की तकदीर में;
कभी तो हो अगवानी तेरी।
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3 comments:

On Monday, September 19, 2005 8:40:00 PM , अनूप शुक्ला said...

ये मुक्तक तो बांध लेते हैं।
रोज वही सूरज का ढलना,
नैनों में दीपक का जलना,
सदियों सी इक शाम बिताकर;
रात गये फिर उनसे मिलना।
वाह।

 
On Thursday, September 22, 2005 12:32:00 AM , Pratyaksha said...

सच ! बहुत सुन्दर
प्रत्यक्षा

 
On Tuesday, November 29, 2005 9:23:00 AM , Pratik said...

आपका पहला वाला मुक्तक तो वाकई अद्भुत है। वाह...।