Tuesday, September 06, 2005

गीत

कुछ गीत बन रहे हैं, मेरे मन की उलझनों में।
कुछ साज़ बज रहे हैं, मेरे मन की सरगमों मे॥

कुछ है जो कहा नहीं जाता, अपनी ही ज़ुबां से,
कुछ बात छिपी हुई है, मेरे मन की चिलमनों में।

अनन्त से क्षिति तक, छाई है एक खुमारी,
मय सी बरस रही है, मेघों की गरजनों में।

यामिनी बन गई है, एक अनकही सी कहानी,
ऊषा खो गई है, सन्ध्या की धङकनों में।

3 comments:

अनूप शुक्ला said...

कुछ गीत बन रहे हैं, मेरे मन की उलझनों में।
कुछ साज़ बज रहे हैं, मेरे मन की सरगमों मे॥
ये तो बहुत अच्छी तुक बनी.बधाई

हृदय पुष्प said...

muje ummid hai ki aap aur achchha likengi. shubhkamanayen

Shikha Deepak said...

कुछ है जो कहा नहीं जाता, अपनी ही ज़ुबां से,
कुछ बात छिपी हुई है, मेरे मन की चिलमनों में।
............क्या बात है...........वल्लाह।