Friday, January 22, 2010

कहानी नीयति भाग १


"हैलो आंटी! मैं सोनिया बोल रही हूं। प्रियंका है क्या?" अपनी प्यारी सखी से बात करने की बैचैनी मेरे स्वर में साफ झलक रही थी।
उधर से आंटी की बुझी हुई आवाज़ आई, "सोनिया कैसी हो बेटा? बहुत दिनों बाद फोन किया। प्रियंका तो कोर्ट गई है। आज उसके केस की तारीख है। तुम्हें तो सब पता ही है।"
मुझे उनकी आवाज़ सुनकर एक झटका सा लगा। और अपने आप पर ग्लानि भी हुई कि मैं सचमुच करीब एक साल के बाद फोन कर रहे थी प्रियंका को।
उधर से आंटी की फिर से आवाज़ आई "क्या भारत आई हुई हो? वक्त मिले तो मेरठ आओ। तुम्ही कुछ समझाओ प्रियंका को।" मन हुआ कि सब कुछ पूछे आंटी से कि क्या हुआ पिछले एक साल में। प्रियंका के केस का क्या हुआ। और उसे समझाना क्या है। पर जाने क्यों आंटी से ज्यादा बात करने का मन नहीं हुआ। पता था वो बात कम करेंगी और प्रियंका की किस्मत को कोसेंगी ज्यादा और साथ साथ मेरी किस्मत के गुणगान करती जायेंगी।
यही सोंच कर मैंने बात ज्यादा आगे न बढातए हुये कहा। "हां आंटी दो दिन हुये आये हुये। बस एक हफ्ते के लिये आये हैं। भाई की शादी है। कल फिर से फोन करेंगे प्रियंका से बात करने के लिये। ये कह कर मैं ने फोन रख दिया। पर मन प्रिया में ही उलझा रहा।

घर में शादी की गहमा-गहमी होते हुये भी मन किसी काम में नहीं लगा। मन सालों पहले की हमारी दोस्ती की यादों में गोते लगाने लगा। प्रियंका और मेरी दोस्ती ग्रेज़ुयेशन में हुई थी। वो मेरे घर के पास ही रहती थी। फिर भी इंटर कालेज अलग-अलग होने के कारण हम लोग पहले एक दूसरे को नहीं जानते थे। पर बी ए में साथ आने जाने की वजह से हम जल्दी ही गहरे दोस्त बन गये थे। मेरे और उसके सब्जैक्ट भी लगभग एक से ही थे। मेरे इतिहास, इंग्लिश और पालिटिकल साइंस और उसके इतिहास, इंग्लिश और इक्नोमिक्स।
सुबह सबसे पहले इतिहास के पीरियड के लिये हम लोग साथ घर से साइकल पर निकलते। बातें करते हुये रास्ते का पता ही नहीं चलता था। फिर फ्री पीरियड में हम दोनों साथ कैटीन में जा बैठते।
उसके घने काले बाल, गोरा रंग, बात करने का धीमा लहजा, हंसते हुये गालों पर पडते डिम्पल सब उसे एक बेहद आकर्षक और खास बना देते थे। लडके तो थे ही उसके व्यक्तित्व से प्रभावित, लडकियां भी उससे बात करने और दोस्ती करने के बहाने खोजा करती थीं। पर वो थी सबसे अलग-थलग। एकदम सीधी-साधी। उसे ज्यादा दोस्त बनाना पसंद ही नहीं था। बात सबसे करती पर दोस्तों में सिर्फ मुझे गिनती थी। अपनी सब बातें हमें बताये बिना उसे चैन नहीं मिलता था। पर मेरे उसके अलावा भी और बहुत से दोस्त थे। अगर मैं कभी किसी और के साथ बात करने में लग जाती तो वो बस मायूस सी हो जाती पर शिकायत कभी नहीं करती। जलना या किसी की बुराई करना तो मानों उसके स्वभाव में ही नही था। पढने में भी बहुत अच्छी थी। इतिहास और इक्नामिक्स जैसे विषयों के साथ भी उसके फर्स्ट क्लास मार्क्स बने हुये थे।
फर्स्ट ईयर खत्म होने पर छुटिट्यों में हमारा एक दूसरे के घर आना-जाना बढ गया, और दोस्ती भी कुछ और गहरी हो गई। मेरे किराये के घर में तो हमें जगह नहीं मिलती थी बतियाने के लिये। इसलिए हम लोग ज्यादातर उसके घर में मिलते। उसका कमरा उसी की रुचि के अनुरूप बहुत ही सादा संवारा हुआ पर बहुत ही सुकून देने वाला था। वो कभी हमसे आइल पेंटिग सीखती कभी क्छ कढाई करना। बहुत ही जल्दी सबकुछ सीख जाती।
उसकी मम्मी एक बुटीक चलातीं थी और मेरी कलात्मकता से बहुत प्रभावित रहतीं थी। उनमें और प्रियंका में पर बहुत अंतर था। वो थीं पूरी बिजनेस माइंडेड और प्रियंका को बनावट या झूंठ कहीं छू कर भी नहीं गया था। वो अपने बडे-भाई और बहन से बिल्कुल अलग थी। एक दिन आंटी ने यूं ही मजाक में कहा था, "सोनिया! तू पंजाबी होती तो अपने शेखर की शादी तुझसे ही कर देती। मेरे बुटीक को कोई संभालने वाला मिल जाता।" आंटी की बात मुझे बहुत बुरी लगी पर क्या जवाब देते। तभी देखा सामने से से शेखर भइया जा रहे हैं। उनकी मुस्कुराहट से साफ पता चल रहा था कि उन्होंने आंटी की बात सुन ली है।
प्रियंका को भी ये सब अच्छा नहीं लगा। बोली, "मम्मी क्या फालतू की बात करती रहती हो।" और हम उठ कर उसके कमरे में आ गये। उसके बाद से मेरा उसके घर जाना कम हो गया। वो खुद ही मुझे न बुलाकर मेरे घर आ जाती।
कालेज खुलने पर तो बस पूरा दिन साथ ही बीतता। पता ही नहीं चला कब वक्त पंख लगाकर उड गया और हम लोग ग्रेजुयेट हो गये। मैंने इतिहास में एम ए के लिये दूसरे कालेज में एड्मिशन लिया और प्रियंका ने उसी कालेज में इक्नामिक्स में एम ए की पढाई जारी रखी। हमारी दोस्ती पहले के जैसी ही कायम थी। इसी बीच उसकी बहन की शादी तय हो गई। हमने पंजाबी शादी की हर रस्म में बढ चढ कर भाग लिया। कितने सुहाने दिन थे वो पूरी दुनिया अपनी मुठ्ठी में लगती थी।
प्रियंका की दीदी की शादी के कुछ दिन बाद ही वो किसी काम से मेरे घर आई थी। मेरा मौसेरा भाई भी उस दिन आया हुआ था जिसे हांथ देखना आता था। उसकी बताई कोई बात कभी गलत नहीं निकलती थी। प्रियंका को मैंने उसके बारे में पहले भी बताया हुआ था। उस दिन हमेशा अजनबियों के सामने गम्भीर बनी रहने वाली प्रियंका मेरे पीछे पड गई कि आज मेरा हांथ भी दिखवा दो। और उसका हांथ देखकर हमेशा मुंह पर ही अच्छा बुरा बोल देने वाले मेरे भाई ने चुप्पी साध ली। बहुत पूंछने पर भी उसने प्रियंका के सामने कुछ नहीं कहा। बाद में उसके जाने के बाद बोला, "इस प्यारी सी लडकी को प्यार में हमेशा धोखा मिलेगा। कभी खिल कर जी नहीं पायेगी बेचारी।" मैंने हमेशा की तरह उसकी बात को हंसी में उडा दिया और कहा, "अच्छा हुआ तुमने उसके सामने कुछ नहीं कहा। वो तो जरा सी बात को दिल से लगा कर बैठ जाती है। बेचारी तुम्हारी बात से ही कुम्हला जाती। "
बाद में प्रियंका बार-बार पूंछती रही कि क्या बताया तुम्हारे भाई ने हमारा भविष्य । मैंने हर बार उसकी बात टाल दी। बस एक बार कहा,"प्रियंका तुम किसी से प्यार मत करना।"
मेरी बात पर वो खिलखिला कर हंस पडी। बोली, "पागल हो क्या? इतने दिनों में बस इतना ही समझ पाई हो अपनी सहेली को। मुझे अपने मां- पापा की इज्जत जान से प्यारी है। पापा कभी भी प्रेम विवाह के लिये राजी नहीं होंगे। तो मैं प्रेम कैसे कर सकती हूं। जिस राह जाना नहीं, उसके कोस क्या गिनना।"
हम मैं उसका हंसता हुआ चेहरा देखती ही रह गयी और मन ही मन अपने आप को समझाया कि कौन इतनी प्यारी शख्सियत को प्यार नहीं कर बैठेगा। जो भी इसकी राह में कांटे ले कर आयेगा उसको ये फूल सी लडकी अपना बना लेगी।

2 comments:

मनोज कुमार said...

अच्छी कहानी। अगली कड़ी का इंतज़ार है।

हिमांशु । Himanshu said...

बेहतरीन कहानी । आभार ।
अगली कड़ी की प्रतीक्षा ।