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Sunday, March 12, 2017

जाती हुयी ठण्ड

आज शिवरात्रि थी, किचेन से भुने आलू और मूंगफली की खुशबू आ रही थी| ठंड बस जाते जाते रुक सी गयी थी| आँगन में ढेर साड़ी धूप फैली हुई थी और वही कोने में पड़ी एक आराम कुर्सी पर साकेत अधलेटा सा पड़ा था| उसने सीधी धूप से बचने के लिए चेहरे पर अखबार रखा हुआ था| उसके हाथ में एक कागज़ था जिसे देर तक पढ़ने के बाद ही वो आँख बंद करके धूप सेंकने लगा था| तभी साकेत की माँ ने किचेन से आवाज़ दी, बेटा अन्दर जाके आराम से सो जा| फिर तुझे कल जाने के लिए पैकिंग भी करनी है| साकेत माँ की बात सुनकर अंदर अपने कमरे में आ गया| बिस्तर पर लेटकर वो फिर से अपना अपॉइंटमेंटलैटर देखने लगा| उसे याद आने लगा ऐसी ही जाती हुई ठण्ड का वो दिन था| साकेत तब नौवी क्लास में था| पढ़ने में वो शुरू से अच्छा था, पर इधर कुछ दिनों से उसका दिमाग पढाई से उचटता जा रहा था| कारण था उसी के क्लास में पढ़ने वाली शिवानी| वैसे तो उसके क्लास में लडके और लड़कियाँ आपस में ज्यादा बात नहीं करते थे, पर कुछ दिनों पहले शिवानी ने क्लास में उससे, उसके नोट्स मांगे थे और बस उसके बाद से साकेत के दोस्तों को उसे चिढाने का मौका मिल गया था| और फिर वो उम्र भी ऐसी थी जब शरीर के साथ कितने मानसिक बदलाव भी आ रहे थे| उसके दोस्त उसे बार बार कहते कि शिवानी उस में इंटरेस्टेड है तो उसे भी कोई कदम उठाना चाहिये| साकेत को भी यही लगता कि वो शिवानी को चाहने लगा है| किताबों में भी उसे बस शिवानी ही दिखायी देती| और फिर दोस्तों के बार-बार उकसाने और अपने दिल के हांथों मजबूर होकर उसने शिवानी को ख़त लिखने का फैसला कर लिया| ढेर सारे कागज़ बर्बाद करने के बाद आखिर उसने प्यार का वो पहला ख़त लिख ही लिया| वो आराम से बिस्तर पर लेट कर उस लैटर को पढ़ने लगा| उसके चेहरे पर मुस्कराहट थी, उसे अहसास ही नहीं हुआ की रात के १२ बज चुके थे इतनी देर तक उसके कमरे की लाइट जली देख कर उसके पापा कमरे में आये, और बोले क्या बात है भई आज आधी रात तक पढाई हो रही है, कल कुछ टेस्ट है क्या| अब साकेत को काटो तो खून नहीं| वो क्या जवाब देता| उसने लैटर जल्दी से अपने बैड के पीछे डाल दिया और संभल कर बैठ गया| और बोला कुछ नहीं पापा बस ऐसे ही पढाई कर रहा था| पर पापा की नज़रों से कुछ छिप सकता था क्या| झुक कर उन्होंने जमीन पर पड़े हुए पन्नो को उठाया और देखने लगे| प्रिय शिवानी, प्यारी शिवानी से ज्यादा कुछ उन पर नहीं लिखा था पर पापा समझ गए कि चक्कर क्या है| साकेत की साँसे अटकी हुयी थीं, उसे समझ नहीं आ रहा था की पापा का क्या रिएक्शन होगा| उसकी पापा से कोई ज्यादा दोस्ती नहीं थी वो तो माँ के ही ज्यादा करीब था| उसे लग रहा था कि आज तो पिटाई होनी ही होनी है| पर ऐसा कुछ नहीं हुआ| पापा आराम से आकर उसके बैड के सामने की कुर्सी पर बैठ गए और उन्होंने गहरी आवाज़ में कहना शुरू किया| बेटा इस उम्र में ऐसा होता है, ये आकर्षण पूरी तरह स्वाभाविक है| इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। मैं तुम्हें डाँट नहीं रहा हूँ बस तुम्हारे साथ अपना अनुभव बाँट रहा हूँ । मैं जब तुम्हारी उम्र का था तो मेरे साथ भी ऐसा हुआ था| मैं भी एक लड़की के प्यार में पागल हो गया था, पढाई लिखाई सब भूल बैठा था| फिर तुम्हारे दादा जी को इसका पता चल गया और उन्होंने मेरी वो पिटाई की क्या बताऊँ| 9th में मैं ग्रेस मार्क्स से पास होके किसी तरह 10th में पहुंचा| मेरे सब पुराने दोस्त बदल गए| मैं हींन भावना से भर गया। फिर दसवीं में मेरे साइंस के टीचर बहुत ही समझदार थे| वो टीन एज की सायक्लोजी को समझते थे| उनकी बातों का मुझ पर गहरा असर पड़ा| और मैंने वापस पढाई में मन लगाना शुरू कर दिया| उनकी बातों से ही मुझे समझ में आया कि प्यार में कोई बुराई नहीं है, बस हर आकर्षण को प्यार नहीं समझ लेना चाहिए| और अब एक उम्र जीकर मुझे ये समझ में आया है की १४ -१५ की उम्र में हमें प्यार के मायने भी नहीं पता होते हैं| बस इससे ज्यादा कुछ नहीं है मेरे पास कहने को| बस फिर पापा उठे उसे हलके से गले लगाया और कमरे से चले गए| उस दिन के बाद पापा ने इस बात का कोई जिक्र नहीं किया| बहुत दिनों तक शिवानी को लिखा वो लैटर साकेत के बैग में रखा रहा, फिर उसने उसे उठाकर अलमारी के कोने में डाल दिया| उस दिन के पापा के इतने शांत तरीके से समझाने के बाद साकेत को समझ में आ गया कि वो शिवानी से सच में प्यार नहीं करता बस दोस्तों के उकसाने पर कूल दिखने के चक्कर में वो ये सब करने चला था| और बस फिर साल गुज़रते रहे और वो अपनी मंजिल की तरफ बढ़ता गया और आज उसके हाँथ में उसकी पहली नौकरी का अपॉइंटमेंट लैटर था| साकेत सोंच रहा था कि उस दिन अगर उसके पापा ने उसे ठीक से समझाने के बजाय डाँटा या मारा होता तो क्या वो आज वो बन पाया होता, जो वो आज बन पाया है। शायद वो कहीं भटक कर अपनी राह खो चुका होता। पुरानी बातें याद करके उसके चेहरे पर फिर से एक मुस्कान आ गयी। जाती हुई ठण्ड का मौसम उसे सबसे ज़्यादा पसंद था। और इस साल तो ये मौसम उसके लिए एक अच्छी सौग़ात लेकर आया था। 

रेशमी साडी


Tuesday, February 28, 2017

लाल धागा

लाल धागा

शारदा जी ने रोज़ की तरह ही अपने जूते बाहर बने शू रैक से लेने के लिए दरवाज़ा खोला| रोज़ सुबह ही नियम से वो टहलने जातीं थीं| जाते समय वो अपनी दोनों पोतियों निषा और दिशा को बस स्टाप पर स्कूल की बस में चढाती और फिर कालोनी के पार्क में वाक् करतीं| अपनी डायबिटीज़ को कन्द्रोल में रखने के लिए वो अपना नियम बहुत कम ही तोड़तीं थीं| आज जब उन्होंने अपने वाकिंग शूज़ उठाये तो उन पर एक लाल धागा रखा हुआ था| वो धागा बीच बीच में पीला भी था, शारदा जी को ये पूजा में बाँधने वाले कलावे के धागे के जैसा लगा| उस वक्त उन्होंने उस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और जल्दी से जूते उठाकर उन्हें पहनकर वाक् पर जाने के लिए तैयार हो गयीं| इस बीच निषा और दिशा भी तैयार होकर आ गयीं| निशा ने जब अपने जूते शू रैक पर से उठाये तो उसमें भी एक लाल धागे का टुकड़ा था| उसने पूछा, “ये धागा कैसा है दादी?” शारदा जी ने कहा पता नहीं बेटा तुम जल्दी से जूते पहनो, नहीं तो बस छूट जायेगी| दोनों ने जल्दी से जूते पहने और अपने मम्मी पापा को बाय करते हुए दादी के साथ लिफ्ट की तरफ बढ़ गयीं|

रोज़ की ही तरह दोनों की बातें चल रहीं थीं| दिशा ने कहा, “दादी आपको पता है हमारे पड़ोस वाले फ़्लैट में नए लोग रहने आ गए हैं| और मैंने वहां एक छोटी सी लड़की को भी देखा है| हम लोगों को खेलने के लिए एक नयी दोस्त मिलने वाली है|”

शारदा जी ने सोंचा चलो अच्छा है बहुत दिनों से वो फ़्लैट खाली पड़ा था, किसी के आकर रहने से रौनक हो जाएगी| उन्होंने दोनों बच्चों के बस में चढ़ाया और वाक् करने लगीं| पैंसठ साल की शारदा जी अपने बेटे पंकज और बहू प्रिया तथा दोनों पोतियों निशा और दिशा के साथ मुंबई महानगर के एक अपार्टमेंट में रहतीं थीं| तीन साल पहले उनके पति का स्वर्गवास हो चुका था| कुछ महीनों तक बहुत उदास रहने के बाद उन्होंने जीवन की सच्चाई को स्वीकार कर लिया था| वो अपने पति राकेश को याद तो करतीं थीं, पर जिंदगी को जीना उन्होंने सीख लिया था| वो अपने आप को घर के कामों में उलझाये रखतीं या कोई किताब पढ़ती रहतीं| पढने का उन्हें हमेशा से शौक था और अब इस उम्र में उनके पास वक्त ही वक्त था अपने इस शौक को पूरा करने का| वो आधुनिक ख्यालात की, वक्त के साथ चलने वाली महिला थीं| सुबह की सैर उनकी सेहत के साथ-साथ उनके मन को भी तारो-ताज़ा रखती थी| आज भी एक घंटा टहलने के बाद वो पार्क में बनी बेंच पर बैठ गयीं| उन्होंने जैसे ही बैंच पर हाँथ रखा उनका हाथ किसी नुकीली चीज़ पर पड़ा और उनका हाँथ कट गया, खून की कुछ बूंदे छलक कर बैंच पर गिर गयीं| उन्होंने देखा कि लोहे की बैंच थोड़ी सी कटी हुयी थी और उसी पर उनका हाथ पड़ गया था| खून देखकर उनका मन ख़राब हो गया| वो घर की तरफ चल पड़ीं| जब वे घर पहुंची तो पंकज और प्रिया आफिस जाने के लिए तैयार थे| उन्हें विदा करने के बाद उन्होंने एक बैंड एड अपने हाथ पर लगा ली और पता नहीं क्यों उन्हें उस लाल धागे का ख्याल आ गया| उन्हें समझ नहीं आया की वो धागा क्या था और कहाँ से आया था|

दोपहर में वो आराम करने के लिए लेटी हीं थीं की निशा की टीचर का फोन आ गया कि निशा के पैर में खेलते हुए चोट लग गयी है| कोई चिंता की बात नहीं है, बस उन्हें इन्फार्म करने के लिए फोन किया है| शारदा जी का मन नहीं माना और कैब बुलाकर वो स्कूल के लिए रवाना हो गयीं| स्कूल पहुंचकर उन्होंने देखा की सचमें ज्यादा चोट नहीं थी, बस पत्थर पर गिरने से पैर थोडा सा कट गया था और खून देखकर निशा डर गयी थी| दादी को स्कूल आया देखकर दिशा भी उनके पास आ गयी| दोनों ही दादी के साथ घर जाने की जिद करने लगे| प्रिंसिपल ने शारदा जी के कहने पर दोनों को घर जाने की इजाजद दे दी| निशा और दिशा को लेकर जब शारदा जी घर पहुंची तो कारीडोर में फिर से तीन चार लाल धागे बिखरे हुए थे| पता नहीं क्यों शारदा जी का मन ख़राब हो गया|

अगले दिन फिर से जब शारदा जी ने वाक् पर जाने के लिए दरवाज़ा खोला तो लाल धागे के दो टुकड़े ठीक सामने मैट पर पड़े हुए थे| उनका मन कुछ अनमना सा हो गया| दोनों बच्चों को लेकर वो घर की तरफ चल पड़ीं| आज वाक् में उनका मन नहीं लगा| उन्हें अपने बचपन की याद आने लगी कि कैसे उनकी दादी ने एक बार बताया था कि उनके घर पर किसी ने कुछ टोना-टुटका कर दिया था| फिर उन्हें अपनी सोंच पर हैरानी होने लगी| वो ऐसी बेवकूफी की बात सोंच भी कैसे सकती हैं| वो कोई बिना पढ़ी-लिखी अन्धविश्वासी औरत नहीं थीं| उन्होंने अपनी सोंच को झटक दिया और घर की तरफ चल पड़ीं| घर पहुंची तो देखा प्रिया शू रैक में से अपनी सैंडिल निकाल रही थी, उसने वही लाल रंग का धागा अपनी निकाल कर अपनी सैंडिल से फेंक दिया| शारदा जी बिना कुछ कहे घर के अन्दर चली गयीं| दोनों के जाने के बाद उनका मन ठीक नहीं था इसलिए वो अपनी कोई किताब लेकर पढने बैठ गयीं| थोड़ी देर में ही दरवाजे की घंटी बजी| उन्होंने जाकर दरवाज़ा खोला तो देखा प्रिया अपनी एक दोस्त के साथ खडी थी| उसकी दोस्त उसे सहारा देकर अन्दर लायी और उसने बताया की प्रिया का पैर मुड़ने से थोड़ी सी मोच आ गयी है| शारदा जी को सुबह का दृश्य याद आ गया जब प्रिया ने लाल धागा अपनी सैंडिल में से निकाल कर फेंका था| उन्हें अब सचमुच लगने लगा था कि कोई बात तो ज़रूर है| कहाँ से आ रहे हैं ये लाल धागे|

शाम को पंकज के आफिस से आने के बाद दोनों बच्चे जिद करने लगे की आइसक्रीम खाने जाना है| आज चूँकि शुक्रवार था तो सबका मन ही बाहर जाने का बन गया| डिनर और आइसक्रीम के बाद घर पहुँचते हुए नौ बज गए थे| पंकज ने कार पार्क करके जब दरवाज़ा बंद किया तो पता नहीं कैसे उसका अंगूठा दरवाजे में आ गया| थोड़ी देर के लिए तो दर्द से उसका चेहरा जर्द पड़ गया पर थोड़ी देर में उसे आराम आ गया, बस अंगूठे पर एक नीला निशान रह गया| वो लोग बातें करते हुए ऊपर आ गए| पंकज खुद हैरान था कि कैसे उसका हाँथ कार के दरवाजे में आ गया|

अगले दिन शनिवार था, शारदा जी ने आज सैर पर जाना टाल दिया| उनका मन तो आज दरवाज़ा खोलने का ही नहीं कर रहा था| आज छुट्टी का दिन था तो निशा दिशा ने कहा की चलो दादी हम लोग अपने नए पड़ोसियों से मिलकर आते हैं| शारदा जी को भी ये ख्याल अच्छा लगा| उन्होंने दोनों से कहा चलो उनके घर ले जाने के लिए पहले कुकीज़ बेक करते हैं, खाली हाँथ जाना अच्छा नहीं लगेगा| दोनों पोतियों की मदद से शारदा जी ने कुकीज़ बनायीं और उन्हें एक बास्केट में सजा कर वो निशा और दिशा को लेकर पड़ोस के फ़्लैट में जाने के लिए तैयार हो गयीं| दरवाज़ा खोला तो लाल धागे के कुछ टुकड़े उनके स्वागत के लिए पहले से मौजूद थे| उन्हें अनदेखा करके, पर ये ध्यान रखते हुए कि उनका पैर उन धागों पर न पड़े, उन्होंने पड़ोस के फ़्लैट की घंटी बजायी| दरवाज़ा दिशा की उम्र की एक छोटी सी लड़की ने खोला| शारदा जी ने उसे हैलो कहा और बताया की वो उनकी पडोसी है| निशा और दिशा ने भी उसे हेल्लो किया और अपना नाम बताया| उसने भी अपना नाम रिनी बताया और अन्दर से अपनी मम्मी को बुला लायी| रिनी की मम्मी रैन्सी ने उन्हें अन्दर बुलाया और सोफे पर बैठने को कहा| घर के अन्दर पैर रखते ही शारदा जी को हर जगह छोटे छोटे लाल धागे दिखाई दिए| तभी रिनी अन्दर से आई और उसकी गोद में एक छोटी सी बिल्ली थी| रिनी ने बताया की उसकी बिल्ली का नाम मिटन है| मिटन रिनी की गोद से कूद कर वहां पड़े धागों से खलने लगी| निशा और दिशा भी मिटन के पीछे दौड़ कर खेलने लगीं| अब तक शारदा जी को लाल धागे का रहस्य समझ में अ गया था| वो मन ही मन मुस्कुरा उठीं| सोंचने लगीं की अच्छा हुआ की अपने मन के वहम का किसी से कोई जिक्र नहीं किया|

मन भी कितना अजीब होता है| जरा सी बात पर क्या-क्या वहम पाल लेता है| रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में छोटी-मोटी चोट लग जाना बहुत आम बात है| उसे किसी अंधविश्वास से जोड़ना सही नहीं है| 

Thursday, February 23, 2017

ध्वनि (कहानी)

तरंग हॉस्पिटल के वेटिंग एरिया की एक चेयर पर बैठी हुई थी| उसका हाथ अपने उभरे हुए पेट को प्यार से सहला रहा था, और उसका दूसरा हाथ अपने पति अनंत की उँगलियों में उलझा हुआ था| वो दोनों एक दूसरे को देख रहे थे और शायद आँखों से ही बातें कर रहे थे| उन्हें बात करने के लिए शब्दों की ज़रूरत नहीं थी| आँखें, स्पर्श और उँगलियाँ हीं काफी थी दोनों को बातें करने के लिए, वो दोनों एक दूसरे से बेहद प्यार करते थे और साथ ही मूक-बधिर थे| इसलिए शब्द उनके बीच में कभी नहीं आते थे, झगडा भी होता था तो उँगलियों के इशारों में| तरंग माँ बनने वाली थी और, नौ माह का समय पूरा हो चुका था| और आज वो रूटीन चेकअप के लिए फिर से हास्पिटल आये थे|
तरंग की माँ श्रध्दा भी हर बार की तरह उनके साथ ही थी और सामने की कुर्सी पर बैठी तरंग और अनंत को देख रहीं थीं| उन्हें याद आ रहा था कि आज से २५ साल पहले ऐसे ही एक दिन वो भी तरंग के जन्म के समय हास्पिटल आयीं थीं, तब उनके मन में कोई शंका नहीं थी| वो पहले ही तीन साल के बेटे उमंग की माँ थीं| बहुत ही प्यार करने वाले और उन्हें समझने वाले पति विवेक उनके साथ थे| उनके सास-ससुर और माँ-पिता दोनों परिवारों में बहुत ही अच्छे सम्बन्ध थे| ज़िन्दगी बहुत ही अच्छे से चल रही थी| बेटे उमंग का नाम रखते समय ही उन्होंने सोंच लिया था कि वो अपने दूसरे बच्चे का नाम, चाहे वो बेटा हो या बेटी तरंग ही रखेंगी| उमंग-तरंग उनके दो बच्चों से उनका घर गुलज़ार हो जाएगा| और जब तरंग पैदा हुयी तो उनकी खुशियों का ठिकाना न रहा| वो सच में थी भी एक गुलाबी रंग की गुडिया सी| इतनी बड़ी-बड़ी आँखें थीं उसकी कि लगता है पैदा होते ही आँखों से बातें करने लगी थी|
 वो कभी भी ज्यादा रोई नहीं| बस जब भी उसके पास जाकर उसे देखो तो उसके चहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान आ जाती| तरंग के जन्म के थोड़े दिन के बाद ही श्रध्दा को कुछ गड़बड़ी का अहसास होने लगा था| वो जब किचन से काम करते हुए रोती हुयी तरंग को चुप कराने की कोशिश करतीं तो उसका रोना बंद ही नहीं होता, उमंग तो जब छोटा था उनकी आवाज़ से ही चुप हो जाता था| पर तरंग को तो जब तक पास जाकर चुप न कराओ, वो चुप ही नहीं होती| उमंग नन्ही बहन के पास जब झुनझुना बजाता तो वो उसकी तरफ मुड़ कर कभी नहीं देखती| जया के मन में कई बार आया कि कहीं ऐसा तो नहीं की तरंग ठीक से सुन न पा रही हो, पर उन्होंने अपने इस विचार को झटक दिया| पर अनहोनी को वो टाल नहीं सकीं| डाक्टर की अगली विजिट में ये कन्फर्म हो गया कि तरंग कभी भी सुन या बोल नहीं सकेगी|
 श्रध्दा को एक बार को तो लगा कि उनकी भरे-पूरे परिवार को किसी की नज़र लगा गयी है| वो ये स्वीकार ही नहीं कर पा रहीं थीं कि नियति उनके साथ इतना क्रूर मज़ाक कर सकती है| कुछ दिन क्या कुछ महीनों तक वो संताप में ही डूबी रहीं| पता नहीं कितने डाक्टरों को दिखाया| पर सबका एक ही जवाब था कि कुछ नहीं किया जा सकता| होम्योपैथी और आयुर्वेद की भी शरण ली पर कहीं से भी कोई फायदा नहीं हुआ|
फिर एक दिन श्रध्दा ने अपने मन को समझा लिया| उन्होंने सोंच लिया कि इससे भी ज्यादा बुरा कुछ हो सकता था| पर उनकी प्यारी सी बेटी उनके पास है और उसमें कोई कमी नहीं है| वो उसे पढ़ा-लिखा कर इतना मजबूत बना देंगी कि उसकी ये छोटी सी कमी किसी को नज़र ही नहीं आयेगी|
और फिर पहले उन्होंने खुद संकेत भाषा को सीखा और बाद में धीरे-धीरे उमंग और विवेक भी इसे आराम से सीख गए| श्रध्दा के प्राण संगीत में बसते थे पर तरंग की वजह से उन्होंने संगीत सुनना छोड़ दिया, उन्हें लगता की संगीत सुनकर वो कुछ गलत कर रहीं हैं| उनका घर एक अजीब सी ख़ामोशी से भर गया| और धीरे धीरे तरंग बड़ी होने लगी| पर तरंग थी अपने आप में एक निराली लड़की| वो सुन-बोल नहीं सकती थी पर उसकी बड़ी-बड़ी आँखे अपने आस-पास की सारी ख़ामोशी सोख लेतीं थीं| उसकी चाल में एक ऋदम थी| एक दिन उसने टीवी पर किसी शो में भरतनाट्यम देखा और जिद पकड़ ली की उसे ये नृत्य सीखना है| श्रध्दा को लगा कि तरंग कैसे भरतनाट्यम सीख पायेगी, नृत्य का एक बहुत बड़ा हिस्सा तो संगीत होता है और बिना सुने तरंग कैसे न्रत्य कर पाएगी| पर तरंग की जिद के आगे श्रध्दा हार गयी और उसे तरंग को भरतनाट्यम क्लासेज़ के लिए लेकर जाना ही पड़ा|
शुरू शुरू में तो तरंग को थोड़ी दिक्कत हुई, फिर धीरे धीरे उसने संगीत की बीट, उसके विस्पंदन, उसकी तरंगों को समझना शुरू कर दिया| तरंग की किस्मत से उसे एक बहुत ही अच्छी और उसकी समस्या को समझने वाली गुरु मिल गयीं| और फिर तो नृत्य और तरंग एक दूसरे के पूरक हो गए|
नृत्य और पढाई दोनों में ही तरंग हमेशा अव्वल आती रही| कभी-कभी श्रध्दा को महसूस होता कि उनकी बेटी में कोई कमी नहीं है| ज़िन्दगी से भरी हुयी अपनी बेटी उन्हें सम्पूर्ण दिखाई देती| तरंग के बड़े होने पर श्रध्दा को अब एक नया ख्याल सताने लगा था, वो ख्याल था उसकी शादी का| दिन-रात उठते-बैठते उन्हें यही परेशानी रहती कि तरंग को क्या कोई ऐसा जीवन साथी मिल पायेगा जो उसकी कमी को समझते हुए उसे सम्मान के साथ अपना सके| विवेक श्रध्दा को समझाते रहते की तुम परेशान मत हो, जैसे अब तक तरंग के जीवन में सब कुछ अच्छा हुआ है, अब भी अच्छा ही होगा| पर माँ के दिल को कोई चिंता करने से रोक पाया है|
पर श्रध्दा की चिंता का अंत जल्दी ही हो गया| उमंग की शादी उसकी पसंद की लड़की से तय हो चुकी थी| उमंग बैंगलौर की एक मल्टिनैशनल कंपनी में जॉब करता था, और बैंगलौर से उसका एक दोस्त अनंत भी शादी में आया था| अनंत भी तरंग की तरह मूक-बधिर था और एक पेंटर था| शादी की भाग-दौड़ और मस्ती में तरंग और अनंत अच्छे दोस्त बन गये| जब दोनों ने शादी करने की इच्छा जतायी तो किसी को भी कोई ऐतराज़ नहीं हुआ| उत्तर और दक्षिण, दोनों रीतिरिवाजों के अनुसार खूब धूम-धाम से दोनों की शादी हो गयी| शादी के बाद अनंत, तरंग के लिए दिल्ली शिफ्ट हो गया| तरंग भरतनाट्यम में पूरी तरह पारंगत हो चुकी थी और स्टेज परफार्मेंस भी करती थी| उसने मूक-बधिर बच्चों के लिए एक डांस स्कूल भी खोल लिया था और श्रध्दा उसके इस काम में उसकी सहायता करती|
और फिर एक दिन तरंग ने उसे वो खुशखबरी सुनायी जिसे सुनने के लिए हर माँ इंतज़ार करती है| पर तरंग की प्रेगनेंसी की खबर सुनने के बाद श्रध्दा चिंता में डूब गयी| वो खुश तो होना चाहती थी पर उसके संशय उसे खुश नहीं होने दे रहे थे| श्रध्दा को यही चिंता थी की कहीं तरंग का बेटा या बेटी भी अनंत और तरंग की तरह ही न हों| श्रध्दा भूल चुकी थी कि तरंग और अनंत अपने आप में सम्पूर्ण हैं| सुनने और बोलने की शक्ति न होते हुए भी वो सफल और खुश हैं| उन्हें इस बात से कोई ऐतराज़ नहीं था कि उनका बच्चा कैसा हो| वे उसे अपनाने के लिए पूरी तरह से तैयार थे| श्रध्दा डाक्टर की हर विज़िट के लिए तरंग और अनंत के साथ हास्पिटल आती और हर बार डाक्टर से वही सवाल करती कि क्या उनका बच्चा भी उनके जैसा होगा| और डाक्टर श्रध्दा को समझाने की कोशिश करता कि इस बात की ९०% उम्मीद है कि उनका बच्चा नार्मल होगा, मतलब वो सुन और बोल सकेगा, पर १०%इस बात की उम्मीद है कि उनका बच्चा भी उनकी तरह मूक-बधिर होगा|
डाक्टर से मिलने के बाद अनंत और तरंग अपने घर चले गए और श्रध्दा अपने घर आ गयी| श्रध्दा का किसी काम में मन नहीं लगा रहा था| वे उमंग और तरंग की बचपन की तस्वीरें लेकर बैठ गयीं| तभी तरंग के घर से उसकी एक पडोसी का फोन आया की तरंग को लेबर पेन शुरू हो गए हैं और वो दोनों हास्पिटल चले गए हैं|
श्रध्दा भी विवेक को लेकर हास्पिटल पहुँच गयीं| बैंगलौर में भी अनंत के घरवालों और उमंग को खबर कर दी गयी| हॉस्पिटल पहुँच कर तरंग को मूक दर्द से तड़पते देख कर श्रध्दा अपनी सब चिंताओं को भूल कर उसकी तीमारदारी में लग गयीं| विवेक अनंत को सांत्वना देने में लग गए| १२ घंटे के लेबर के बाद तरंग को एक प्यारी सी बेटी हुई| शाम तक सभी लोग अनंत के माता पिता, उमंग और उसकी पत्नी सायरा भी आ गये| तरंग को रूम में शिफ्ट कर दिया गया था|
सभी लोग कमरे में थे और तरंग की बिटिया के आने का इंतजार कर रहे थे| तभी अनंत और विवेक एक नर्स के साथ वहां आ गए| बिटिया को वो लोग चैकअप के बाद डाक्टर के पास से ले आये थे| नर्स ने बच्ची को तरंग की गोद में दे दिया| सब लोग चुपचाप विवेक और अनंत को देख रहे थे जैसे की किसी परीक्षा के नतीजे के इंतजार में हों| किसी की कुछ पूंछने की हिम्मत नहीं हो रही थी| ख़ास-तौर से श्रध्दा के लिए ये एक-एक क्षण काटना मुश्किल हो रहा था| आखिर विवेक ने चुप्पी तोड़ी और मुस्कुराते हुए बताया कि बिटिया बिलकुल नार्मल है| वो सुन और बोल सकेगी| कमरे में एक ख़ुशी की लहर दौड़ गयी| ये सभी के लिए डबल ख़ुशी की बात थी| वैसे तो सभी लोगों को अनंत और तरंग की तरह बिटिया किसी भी रूप में स्वीकार थी पर अब ये खबर सुनकर सभी की ख़ुशी दोगुनी हो गयी थी|  तभी बिटिया की दादी ने पूछा भई नाम क्या रखना है इस गुडिया का| तरंग और अनंत ने एक दूसरे की तरफ अर्थभरी नज़रों से देखा और इशारे से बताया कि उन दोनों ने पहले से ही नाम सोंच रखा है| अनंत ने पास पड़ी मेज से एक कागज़ और कलम उठाया और उस पर लिखा, ध्वनि | तरंग ने अपनी बिटिया को श्रध्दा की तरफ बढ़ाया, श्रध्दा ने उसे अपनी गोद में ले लिया| तरंग ने अपनी उँगलियों कि भाषा में कहा, “माँ! ये है मेरी ध्वनि, आपके लिए! आपने मुझे कभी नहीं सुन
पाया अब इसे जी भर के सुनना| अब इसके साथ संगीत सुनना और इसे अपना संगीत सिखाना|” सभी की आँखें भीगी हुई थीं, पर ख़ुशी के आंसुओ से|

-अभिसारिका 













Monday, September 20, 2010

...एक अनकही कहानी!



लिखना कभी उसका पैशन हुआ करता था.. कुछ लिखे बिना उसे जीना नहीं आता था, लिखना जैसे की उसके लिए सांस लेना जैसा था. कुछ कविता या नज़्म नहीं तो डायरी या फिर यूँ ही बेलौस बस लिखे जाना उसकी आदत सी थी. अगर वो कुछ पढ़ती भी तो उसकी कलम उसके साथ होती थी. किताब पर वो कुछ नहीं लिखती थी पर उसकी साफ़ शफ्फाक किताबों में रक्खी छोटी छोटी पर्चियों में उसकी समझ के अनुसार वो किताब पढ़ी जा सकती थी. उसके पर्स में हमेशा एक सफ़ेद पन्ना और एक कलम जरुर होती थी. पर अपने लिखे हुए को वो संभाल कर नहीं रखती थी ये भी उसकी सभी अजीब आदतों सी एक आदत थी. अपनी आदतों में बंधी हुई थी, और अपनी आदतों से अलग कुछ करने में वो परेशान हो जाती थी, झुंझला जाती थी. एक बंधे बंधाये रूटीन में उसकी ज़िन्दगी चलती थी. बस इसी तरह जीना उसे आता था.....



 
और फिर एक दिन उसकी ज़िन्दगी ने करवट ली, वक्त की डाली पर एक नयी कोंपल नए मौसम के साथ यूँ उगी की पूरी फिजा ही बदल गयी. मुस्कुराहटों के मौसम छा गए. अब अपनी खुली किताब सी ज़िन्दगी वो छिपाने लगी. उसे लगता की उसके जज्बे कोई उसके चहरे  पर ही न पढ़ ले. और लिखना तो बस यूँ ही बंद हो गया. अब वो पढ़ती भी तो कुछ लिखती नहीं की कोई कुछ अंदाजे न लगा ले. यूँ सबसे सब कुछ छिपा कर रखना भी उसकी आदत सी हो गई..अब वो सपनों में जीती थी, उसके ख़्वाब उसकी अमानत थे..और वो अपने ख़्वाबों की दुनिया की शहजादी थी..अब वो लिखती नहीं थी, अपने शब्दों को खुद जीती थी, वो एक जीती जागती कहानी बन गयी थी....एक अनकही कहानी!

Sunday, January 24, 2010

कहानी नीयति अंतिम भाग


पहला भाग
दूसरा भाग

शादी के बाद हम यू एस चले गये और प्रियंका से बातों का सिलसिला धीरे-धीरे कम होता गया। मैं भी अपने घर संसार में व्यस्त हो गयी। एक बिटिया मेरी गोद में आ गई और वो भी एक बेटे की मां बन चुकी थी। उसने अपने बेटे का नाम प्रियांश रखा था। फोन पर ही उसने बताया था," सोनिया मैंने हमेशा से सोंचा था कि मेरा बेटा होगा तो उसका नाम प्रियांश रखेंगे। हम दोनों का नाम ही इस में समा जाता है। प्रियंका और अंश का बेटा 'प्रियांश'।" उसकी आवाज़ एक बार फिर पहले जैसी चहकी हुई थी। मां होने के गौरव से वो भरी-पूरी सी महसूस हो रही थी। मैंने ईश्वर को धन्यवाद दिया और दुआ की कि मेरी सखी यूं ही हमेशा खुश रहे।
पर सब-कुछ ठीक समझना शायद हमारा भ्रम था। दो साल के बाद जब मैं इंडिया आयी तो उसे फोन किया। पर फोन किसी अजनबी लडकी ने उठाया। प्रियंका के बारे में पूंछने पर वो बोली कि यहां कोई प्रियंका नहीं रहती। हमें बहुत ताज्जुब हुआ। कई बार फोन किया पर हमेशा वही जवाब। भाई से बात कर रहे थे तो उसे जाने किस पुरानी डायरी में प्रियंका की मम्मी का नम्बर मिल गया। मैंने उस नम्बर पर फोन किया तो उसकी मम्मी से बात हुई। बोलीं, "प्रियंका तो अब अपने बेटे के साथ यहीं रहती है। हमें तो धोका हो गया बेटा। प्रियंका की तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई। वो लोग पैसे के लालची निकले। न कोई घर था उनका, दुकान भी गिरवी थी। और लडका था शराबी एय्याश। हमारी प्रियंका को घर से निकाल दिया।" ये सब अचानक से सुनकर मेरेतो पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई। प्रियंका ने तो कभी मुझे गुमान भी नहीं होने दिया कि वो किसी ऎसे दौर से गुज़र रही है। फोन पर अभी भी उसकी मम्मी अनर्गल प्रलाप जारी था। ".....तुम कैसी हो सोनिया! तुम्हारा पति तुम्हारा ध्यान तो रखता है। ससुराल में सब कैसे हैं? तुम्हारे एक बिटिया है न?" उनके सवालों के जवाब में ये कहना कि मेरे पति अच्छे हैं। मेरा ख्याल रखते हैं। ससुराल भी अच्छी है; मुझे अंदर किसी गहरे दर्द से भेदे दे रहा था। मेरी सबसे प्यारी सखी किस दर्द से गुजर रही है और मुझे कुछ पता भी नहीं। हमने कहा, "आंटी प्रिया से बात कर सकते हैं?" तो आंटी बोलीं, "वो तो जाब करती है बेटा। उसका एकनामिक्स में एम ए और कम्प्यूटर कोर्स काम आया। उसी की वजह से उसे एक एकाउंटिंग फर्म में नौकरी मिल गई है। उसका मोबाइल नम्बर देते हैं। बात कर लो।"
उसका नम्बर हांथ में लिये कितनी देर हम यूं ही बैठे रह गये। हिम्मत ही नहीं हो रही थी उससे बात करने की। उसके लिये की गई भविष्यवाणी सच हो गई थी और हम अब भी उस पर विश्वास नही कर पा रहे थे। शाम को उसका नम्बर मिलाया तो उसने ही फोन उठाया। मेरी आवाज़ सुनकर उसके आंसुओ का बांध टूट गया, "बोली तुम्हें सब पता चल गया। सोंचा था कि तुम्हें अपने दु:ख से दु:खी नहीं करेंगे। मेरे साथ ऎसा क्यों हुआ सोनिया? मैने तो पूरी शिद्दत से अंश को प्यार किया था। उसकी हर चीज़ को अपना माना था। उसकी दुकान नहीं चलती थी तो मैंने कम पैसे में ही गुज़ारा करना सीख लिया था। मेरे पापा ने उसे दस लाख रुपये नया बिज़नेस डालने के लिये दिये। पर उसने सब पैसा शेयर्स और शराब में उडा दिया। उसने हमें कभी चाहा ही नही। वो तो किसी और से शादी करना चाहता था। पर दहेज के लिये उसे मुझ से शादी करनी पडी। शुरु में उसकी मम्मी ने सब ढंकने की कोशिश की पर बाद में धीरे-धीरे सब खुलता गया। जबतक मेरे पापा पैसे देते रहे मेरी सास का व्यवहार थोडा ठीक था पर मेरे पापा भी कब तक पैसे देते। उसके बाद तो उन लोगों ने हमें खाने तक के लिये तरसा दिया। प्रैग्नैन्सी में लोगों को नई-नई चीज़े खाने की क्रेविंग होती है। पर मुझे तो पेट भर खाना भी नसीब नहीं था। मेरी सास कहतीं कि दिन में अकेले अपने लिये खाना बनाने की क्या जरूरत है। रात का बचा हुआ खा लो। और रात में सिर्फ नपातुला खाना बनाने की इजाजत थी। पूरा दिन मैं भूखी रहती। प्रियांश के होने के बाद भी अंश को अपने बेटे की कोई खुशी नहीं हुई। बल्कि एक बार तो कह दिया कि प्रियांश नाम रख देने से क्या ये मेरा अंश हो जायेगा। प्रियांश भी मेरी सी किस्मत ले कर आया था। उसकी मां को कभी इतना खाने को नहीं मिला कि उसे दूध होता और बाप ने कभी एक दूध का डिब्बा ला कर नहीं दिया। डिलीवरी के वक्त मम्मी- पापा आये तो जो भी जरूरत का सामान था लाकर रख गये। दो महीने होते होते सब सामान खत्म हो गया। जब अंश से दूध का डिब्बा लाने को कहा तो उसने शराब के नशे में चीखना चिल्लाना शुरु कर दिया। तुमने तो देखा था वो अंधेरा घर। रात को ग्यारह बजे वहां उसकी चीखें और मेरे आंसू सुनने वाला कौन था। उस दिन शायद मेरी किस्मत से दुकान में काम करने वाला एक छोटा सा लडका बाहर गैलरी में सोया हुआ था। आवाज़े सुनकर वो अंदर आ गया। और छुपकर सब देखने लगा। तबतक अंश ने मुझे मारना शुरु कर दिया था। कहते हुये भी शर्म आती है कि शराब के नशे में उसने पहले भी कई बार मुझ पर हांथ उठाया था। इसी बीच प्रियांश ने भी भूख से रोना शुरु कर दिया था। मम्मी जी ने आकर खीचकर अंश को अंदर कमरे में ले जाकर डाल दिया। और खुद भी सोने चली गईं। मुझ पर और प्रियांश पर किसी को कोई तरस नहीं आया। पर उस दिन शायद वो छोटा सा लडका मेरे लिये फरिश्ता बन कर आया था। उसने मुझे अंदर से लाकर पानी पिलाया। सहारा देकर वहीं पास पडी चारपाई पर लिटाया। प्रियांश को उठाकर मेरे पास लिटाया। मेरे आंसू पोंछते हुये उसके भी आंसू बह रहे थे। आधी रात में पता नहीं कौन सी जगह से वो थोडा सा दूध लेकर आया। खुद ही बोतल में डालकर उसने प्रियांश को अपनी गोद में डालकर दूध पिलाया।
मेरी सारी शक्ति उस दिन समाप्त हो चुकी थी। ऎसे ही बाहर ओस में चारपाई पर पडे हुये सुबह का धुधंलका भी आ चुका था। पर मेरी ज़िन्दगी में शायद कोई सुबह नहीं थी। फिर भी जीना तो था ही, अपने लिये न सही तो प्रियांश के लीये। यही सोंचकर मैंने एक पेपर पर छोटू को अपने घर का नम्बर देकर कहा कि वो पीसीओ से घर फोन करके कहे को वो लोग प्रियांश के लिये दूध दे जायें। खुद भूखा रहा जा सकता है, पर जिसे आपने नौ महीने पेट में रखकर जन्म दिया हो उसे भूखा देखना बर्दाश्त नहीं हुआ।
छोटू ने जब घर फोन किया तो भैया ने फोन उठाया। उन्होंने सारी बातें छोटू से पूंछ ली। उनका जवान खून अपनी बहन की ये दुर्दशा बर्दाश्त नहीं कर सका और वो तुरंत गाडी लेकर पापा के साथ आये। जब वो लोग घर पहुंचे तो अंश का नशा उतरा नही था। मैंने कभी सोंचा भी नहीं था कि मेरे जीवन की ये परिणति होगी। पापा और भाई मुझे प्रियांश के साथ घर ले आये। जाते-जाते अंश ने कह दिया कि अब कभी वापस लौट कर मत आना।
घर जाकर एक हफ्ता मैं और प्रियांश दोनों बीमार पडे रहे। कुछ सोंचने समझने की भी ताकत नहीं रही थी। इधर मम्मी भी समझा रहीं थीं कि वो तुम्हारा घर है, तुम्हारा पति है, तुम्हारे बच्चे का बाप है। तुम्हें ज़िन्दगी तो उसी के साथ काटनी है। कुछ दिनों में वो सुधर जायेगा। मैं कुछ भी निर्णय लेने में असमर्थ थी। कि एक दिन डाक से एक पत्र आया मेरे नाम। पता नहीं क्यों कुछ गलत का अंदेशा हुआ। पत्र खोलकर पढा तो वो डायवोर्स के पेपर्स थे। मेरे पैरों तले से जमीन खिसक गई। ये तो मैंने कभी नहीं चाहा था। घर में भैया और पापा तो चुप थे पर मम्मी बोले जा रहीं थी कि ऎसे कैसे डाइवोर्स दे सकता है। मजाक है क्या। और बस ऎसे ही मेरी जिन्दगी एक मजाक बन गई। दो साल से कोर्ट में केस चल रहा है। ये तो अच्छा हुअ कि मेरी पढाई काम आई। दिनभर जाब पर वक्त कट जाता है। पर शाम को घर जाकर वक्त काटे नहीं कटता। प्रियांश के साथ वक्त गुज़ारने की कोशिश करते हैं पर शाम को भैया को अपने बच्चों के साथ खॆलता देखता हैं तो उसे भी अपने पापा चाहिये होते हैं। ढाई साल का बच्चा जब अपने मामा को पापा बुलाता है तो ऊसकी नानी उसे समझते हुये नहीं थकतीं कि वो तेरे पापा नहीं हैं वो तेरे मामा हैं। मुझे पता नहीं मेरी ज़िन्दगी का क्या होगा।" एक ही सांस में वो अपने पिछले कई सालों के दर्द को बयान कर गई। हम उससे बस यही कह पाये, "अच्छा हुआ तुम उसे छोड कर आ गई। अब अपनी ज़िन्दगी नये सिरे से शुरु करना।" इस पर वो बोली
" तुम तो विदेश में रहती हो तुम्हें यहां का सिस्टम नहीं पता है। पता नहीं कब मेरे केस का फैसला होगा। हमने तो अपनी किस्मत को स्वीकार कर लिया था। जब डाइवोर्स के पेपर आये थे तब मैं अंश के पास जाकर बहुत रोई थी कि मुझे अपने घर में पडा रहने दे। मैं उससे कभी कुछ नहीं मांगूगी। पर वो नहीं माना बोला उसे मेरे साथ रहना ही नहीं है। तुम्हें नहीं पता शादी के बाद वापस अपने घर में रहना भी पराया लगता है और तलाकशुदा औरत सभी को अवेलेबिल दिखती है।"
मेरे पास उसकी बात का कोई जवाब नहीं था। कभी नहीं सोंचा था कि हमारे बीच ऎसी बातें होंगी। बात का रुख मोडते हुये उसने कहा, "और तुम अपनी बताओ? तुम्हारे पति तो बहुत अच्छे हैं न। बताओ न अच्छे लोग कैसे होते हैं। कभी देखा-सुना नहीं । अच्छे लोग शायद कहानियों में या फिल्न्मों में ही होते हैं। अच्छा! तुम्हारे पति बेटी को प्यार करते हैं न। शायद अगर मेरे भी बेटी होती तो मेरी किस्मत अच्छी होती। मैंने जितने भी घरों में पहले बेटी का जन्म देखा है उनके घर में हमेशा अच्छी किस्मत देखी है। अंश ने तो कभी प्रियांश को गोद में भी नहीं उठाया। उसका तो नाम ही जैसे उसके लिये अभिशाप हो गया है।" उसकी बातों को बस हां-हूं में और इधर-उधर की बातों में टालते गये। चाह कर भी उसे नहीं बता पाये कि मेरे पति की तो जान ही मेरी बिटिया में बसती है। और वो मेरा पल पल पर ख्याल करते हैं अच्छे लोग सिर्फ कहानियों या फिल्मों में नहीं होते। इसी दुनिया के होते हैं। बस अपनी अपनी किस्मत का फर्क है। मुझे तो अभी तक बुरे लोग ही कहानियों या फिल्मों की दुनिया के लगते थे। पर मैं कुछ भी नहीं कह पायी।
यू एस वापस आने के बाद कभी-कभी प्रियंका से बात होती रही। वो अक्सर मुझसे कहती मुझे अपने पास बुला लो। पर मैं क्या कर सकती थी उसके लिये सिर्फ दुआ करने के सिवा।

इतनी देर तक यही सब सोंचते हुये पता भी नहीं चला कि शाम हो गई थी। मेरी बिटिया शोना कब आकर मेरे पास सो गई थी पता ही नहीं चला। उफ ये इस वक्त सो गई, अब आधी रात को उठकर जागरण करेगी। जेटलाग की नींद होती ही ऎसी है। उसे उठाते हुये मन में ख्याल आया कि अब तो प्रियांश भी पांच साल का हो गया होगा। शोना को ऎसे ही सोने देकर मैं टेरेस पर आ गयी और फिर से प्रियंका को फोन मिलाया। इस बार वही चिर-परिचित आवाज़ थी, " हाय सोनिया! कैसी हो? कब आईं?"

"बस दो दिन हुये। तुम कैसी हो केस का क्या हुआ?"
"केस का क्या होना है? शायद कल फैसला हो जाय। पर इस बार फिर मेरी किस्मत मेरे साथ खेल रही है।
"क्या हुआ? बताओ तो सही।"
"प्रियांश पांच साल का हो गया है। पांच साल के बाद मेल चाइल्ड की कस्टडी पिता के पास रहती है।मैं चाहूं तो उसे अपने पास रख सकती हूं। पर मेरी मम्मी मेरे पीछे पडी हैं कि प्रियांश को अंश के पास भेज दो उसे तुम्हें कोई मुआवज़ा देने की भी जरूरत नहीं है। अंश भी सिर्फ इसलिये इस बात पर राज़ी हो गया है कि उसे कोई मुआवज़ा नहीं देना पडेगा। ये लोग मेरी दूसरी शादी करवाना चाहते हैं। और पांच साल के बच्चे के साथ शादी होना मुश्किल है। इसीलिये ये लोग उसे छोडने को कह रहे हैं। पर उसके बाद मैं प्रियांश से कभी नहीं मिल पाउंगी। ये उन लोगों की शर्त है। सोनिया! मुझे कुछ समझ नहीं आता क्या करूं? प्रियांश तो अंश को जानता तक नहीं है। अपने नन्हें-नन्हे हांथो से सदा मेरे आंसू पोंछता रहता है। उसके साथ मेरा खून का ही नहीं दर्द का भी रिश्ता है। और दर्द के रिश्ते ज्यादा अनमोल होते हैं ये तो मैंने अपनी ज़िन्दगी के अनुभव से जाना है। शादी मैं भी करना चाहती हूं। ऊब गई हूं इस पराये से घर में अपनों के बीच रहते रहते। ये लोग अपनी खुशियां भी मेरे दु:ख को देखकर खुल कर नहीं मना पाते। मैं एक बेटी न होकर सजा बन गई हूं। क्या करूं तुम्हीं बताओ?" मेरे पास उसके सवालों का हमेशा की तरह कोई जवाब नहीं था। बस उसे समझा दिया, "कि तुम सोंच-समझ कर कोई फैसला करना। ये तुम्हारी ज़िन्दगी है।"
"मुझे चाहिये ही नहीं ऎसी ज़िन्दगी।"
"उदास मत हो! प्रिया कोई न कोई तुम्हें भी ज़रूर मिलेगा जो तुम्हारा दामन भी खुशियों से भर देगा।
"मुझॆ ज़िन्दगी से कोई उम्मीद नहीं। बस आदमी नाम का ऎसा कोई सहारा मिल जाय जो मुझे मेरे प्रियांश के साथ स्वीकार कर ले।"
"ऎसा होगा प्रिया। तुम उम्मीद मत छोडो"
"पर अभी तो पहले मुझे अपने प्रियांश के बारे में कोई फैसला लेना है। कोर्ट ने कल तक का वक्त दिया है।"
"....."
"मैं क्या करूं सोनिया?"
"मुझे भी कुछ समझ नहीं आ रहा है। बस इतना कह सकती हूं कि मेरी सारी दुआयें तुम्हारे साथ हैं।"

ये कह कर हमने फोन रख दिया। उसके बाद भाई की शादी की भागदौड में वक्त ही नहीं मिला बात करने का। इक हफ्ते बाद वापस यू एस आ गये। रोज़ ही प्रिया की याद आती। बात करने का मन भी करता पर फोन मिलाने की हिम्मत नहीं होती। पता नहीं प्रियंका ने क्या फैसला लिया हो। या ज़िन्दगी ने उसका क्या फैसला किया हो। पता नहीं प्रियांश उसके पास था या फिर उसने उसे भी हार दिया था। क्या पता उसे कोई ऎसा मिल गया हो जिसने उसे प्रियांश के साथ अपना लिया हो। काश ऎसा हो जाता। यूं ही कशमकश उधेड्बुन में तीन महीने बीत गये।
आज हिम्मत करके मैंने उसके मोबाइल का नम्बर डायल कर ही दिया। उधर से आवाज़ आई, " दिस टेलीफोन नम्बर डज़ नाट एग्ज़िस्ट।"
शायद मैंने फोन करने में देर कर दी थी। पिछले कई सालों से उसके मोबाइल पर ही बात हो रही थी। उसके घर का या कोई और नंबर हमने सेव नहीं किया था। सोंचा नहीं था कि कभी ऎसा होगा कि हम चाहते हुये भी उससे बात नहीं कर पायें गे। बस अब तो यही उम्मीद है कि वो जहां भी हो खुश हो। मेरी सारी दुआयें उस लडकी के नाम हैं जिसने कभी किसी का बुरा नहीं किया। बस सभी से प्यार किया, पर जिसे कभी प्यार नहीं मिला।

Saturday, January 23, 2010

कहानी नीयति भाग २


पहला भाग
एम ए फाइनल इयर में दशहरे की छुट्टियों में वो अपने मामा के बेटे की शादी में मैसूर गई। वहां से लौटकर उसके रंग कुछ बदले से लगे। लगा पहले से ही बेहद खूबसूरत ये लडकी कुछ और भी निखर गई थी। पर कुछ चुप-चाप सी भी लगी। मुझसे वो कुछ छपाना चाहे तो भी छिपा नहीं पाती थी। एक दिन जब वक्त मिला बातों का तो पता चला मैसूर में अपने मामा के घर उसने अपने दिल पर किसी की दस्तक को महसूस किया था। पर वो थी एक मजबूत शख्सियत की मालिक। उसके दिल को चाहें वो अच्छा लगा था। पर उसने अपनी जुबां से कभी कुछ नहीं कहा न उस शख्स ही कुछ महसूस होने दिया। और शायद ये उसके हक में ही हुआ। क्योंकि वो शख्स जिसने उसके कभी किसी के लिये न धडकने वाले मासूम से दिल को धडका दिया था उसके लायक था ही नहीं। वो तो बस उसके दोस्तों से लगी एक शर्त थी। प्रियंका ने उसे एक दिन बात करते सुन लिया था "ये लडकी तो किसी दूसरी दुनिया की ही लगती है। इसे पिघलाना मेरे बस का काम नहीं। भई मैं शर्त हार गया।" ये सुन कर प्रियंका को धक्का जरूर लगा पर वो टूटी नहीं। उसका दिल जरूर टूटा पर उसका किरदार, उसका स्वाभिमान सलामत था। बस ऎसे ही दिन गुज़रते रहे और हम दोनों ने एम ए के साथ-साथ कम्पयूटर कोर्स भी कर लिया।

पढाई खत्म होते ही हम अपने पैत्रक शहर बिजनौर आ गये। खतों और फोन के जरिये हमारी दोस्ती कायम थी। एकदिन फोन पर उसकी चहकती हुई आवाज़ ने बताया कि उसकी शादी तय हो गई है। पंजाबियों में शायद लडके वाले लडकी मांगते हैं। शायद ऎसा ही उसकी बातों से हम समझ पाये कि उसकी दीदी की ससुराल की तरफ से किसी ने रिश्ता भेजा था। लडके का अपना बिजनेस है। लडके की मां किसी स्कूल में पढाती हैं। एक बहन की शादी हो चुकी है। घर में और कोई नहीं है। प्रियंका की मम्मी भी बहुत खुश थीं कि चलो छोटा परिवार है। कोई जिम्मेदारी नहीं है। लडके का जमा जमाया बिजनेस है।
प्रियंका की तो खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था। रोज़ ही मुझे फोन करती। कहती, "अब तो प्यार कर सकती हूं न सोनिया? सच कहूं मुझे तो अंश से प्यार हो ही गया है। इतनी डैशिंग पर्सनौलिटी है अंश की कि क्या बताऊ। मैं तो उनके सामने कुछ भी नहीं हूं। पर जाने क्यों सगाई के बाद भी उन्होंने एक फोन तक नहीं किया।" उसकी सब बातें सुनते हुये मन में न जाने कहां से एक लाइन गूंज गई, "इस प्यारी सी लडकी को प्यार में हमेशा धोखा मिलेगा।" मन ने अपने आप को धिक्कारा कि मैं क्या उलटा सीधा सोंचने बैठ गई। फिर कुछ ही महीनों में उसकी शादी हो गई। प्रियंका के इतना बुलाने पर भी मैं उसकी शादी में नहीं ही जा पायी। बीच-बीच में उससे बात होती रहती। पर पता नही क्यों उसकी बातों में अब वो जोश नहीं होता। कभी कहती सास सामने बैठी हैं। कभी अंश सो रहे हैं। जोर से बात करूंगी तो जाग जायेंगे।
फिर मेरी भी शादी तय हो गई। शादी दिल्ली से होनी थी। मैंने पापा को पहले ही मना लिया कि जाते हुये कुछ देर मेरठ जरूर रुकेंगे। सोंचा था उसके घर जाकर उसे सर्प्राइज़ देंगे। उसके दिये पते पर पहुंचे तो अजीब सा लगा। ढेर सारी लोहे और सीमेंट की दुकानों के बीच एक अंधेरी सी गली का पता था। पहले बाहर से खडे होकर ही आवाज़ लगाई। फिर जब कोई जवाब नहीं आई तो भाई को साथ लेकर अंदर गये। कई बार आवाज़ लगाने पर प्रिया बाहर आई। मुझे देख कर कितना खुश हो गई। हम दोनों जब एक-दूसरे से गले मिले तो दोनों की आखों में आंसू थे। पर प्रियंका बिल्कुल ही बदली हुई लगी।उसके लंबे काले बाल कंधे तक रह गये थे। और बहुत ही दुबली दिख रही थी। उस दो कमरे के छोटे से मकान में वो बिल्कुल अजनबी सी दिख रही थी। मैंने पूछ ही लिया, "तुम तो कह रहीं थी कि तुम्हारा बडा सा बंगला है सिविल लाइन्स में।" पूंछने के बाद मुझे अपने ऊपर पछतावा हुआ। पर तब तक तीर कमान से निकल चुका था जिसने प्रियंका के चेहरे को और मुरझा दिया था। बोली, "है बंगला, पर उसे किराये पर उठा दिया है। मम्मी जी का स्कूल यहीं से पास पडता है और इनकी दुकान भी बाहर है।" मन को एक धक्का सा लगा कि उसके डैशिंग अंश की लोहे की दुकान है।
वो हमें अपने कमरे में ही ले गई। जहां उसके पति देव दिन के ग्यारह बजे सोये पडे थे। उसने धीरे से उन्हें जगाया औए हम लोगों का परिचय कराया। एक हल्की सी हैलो कहकर वो बाहर चले गये। उसके कमरे में उसकी झलक कही भी दिखाई नहीं दी। और उस अजनबी माहौल में मैं उससे कुछ ज्यादा बात भी नहीं कर पायी। फिर भाई भी तो साथ ही बैठा था। बातों से पता चला कि उसे जाइंडिस हो गया था। काफी समय बीमार रही उसी बीमारी में उसके सब बाल झड गये। बोली खाना खाकर जाना। पर मन नहीं माना और रुकने का। हम लोग जब चलने ले गे तो बोली रुको अंश छोड देंगे। पर उसके अंश जब दस मिनट तक बाहर नहीं निकले तो हम लोग वापस चले आये। उसने मुझे एक बिंदी का पत्ता और एक लिपिस्टिक देकर कहा "पहले पता होता कि तुम आ रही हो तो तुम्हारे लिये कुछ अच्छा सा लेकर रखते। तुम्हारी शादी का गिफ्ट उधार रहा।" मैं भरे मन से वापस आ गयी। लौटते हुये भाई ने कहा "दाल में कुछ काला लगता है।" तो हमने उसे डांट दिया। कहा "तुम्हें तो सब दाल काली दिखती हैं, कलर ब्लाइंड हो" कहने को तो हमने उसे कह दिया पर हमें भी सब-कुछ ठीक नहीं लगा। पर अपनी शादी के उत्साह में उसकी चिन्ता कुछ दब सी गई।

Friday, January 22, 2010

कहानी नीयति भाग १


"हैलो आंटी! मैं सोनिया बोल रही हूं। प्रियंका है क्या?" अपनी प्यारी सखी से बात करने की बैचैनी मेरे स्वर में साफ झलक रही थी।
उधर से आंटी की बुझी हुई आवाज़ आई, "सोनिया कैसी हो बेटा? बहुत दिनों बाद फोन किया। प्रियंका तो कोर्ट गई है। आज उसके केस की तारीख है। तुम्हें तो सब पता ही है।"
मुझे उनकी आवाज़ सुनकर एक झटका सा लगा। और अपने आप पर ग्लानि भी हुई कि मैं सचमुच करीब एक साल के बाद फोन कर रहे थी प्रियंका को।
उधर से आंटी की फिर से आवाज़ आई "क्या भारत आई हुई हो? वक्त मिले तो मेरठ आओ। तुम्ही कुछ समझाओ प्रियंका को।" मन हुआ कि सब कुछ पूछे आंटी से कि क्या हुआ पिछले एक साल में। प्रियंका के केस का क्या हुआ। और उसे समझाना क्या है। पर जाने क्यों आंटी से ज्यादा बात करने का मन नहीं हुआ। पता था वो बात कम करेंगी और प्रियंका की किस्मत को कोसेंगी ज्यादा और साथ साथ मेरी किस्मत के गुणगान करती जायेंगी।
यही सोंच कर मैंने बात ज्यादा आगे न बढातए हुये कहा। "हां आंटी दो दिन हुये आये हुये। बस एक हफ्ते के लिये आये हैं। भाई की शादी है। कल फिर से फोन करेंगे प्रियंका से बात करने के लिये। ये कह कर मैं ने फोन रख दिया। पर मन प्रिया में ही उलझा रहा।

घर में शादी की गहमा-गहमी होते हुये भी मन किसी काम में नहीं लगा। मन सालों पहले की हमारी दोस्ती की यादों में गोते लगाने लगा। प्रियंका और मेरी दोस्ती ग्रेज़ुयेशन में हुई थी। वो मेरे घर के पास ही रहती थी। फिर भी इंटर कालेज अलग-अलग होने के कारण हम लोग पहले एक दूसरे को नहीं जानते थे। पर बी ए में साथ आने जाने की वजह से हम जल्दी ही गहरे दोस्त बन गये थे। मेरे और उसके सब्जैक्ट भी लगभग एक से ही थे। मेरे इतिहास, इंग्लिश और पालिटिकल साइंस और उसके इतिहास, इंग्लिश और इक्नोमिक्स।
सुबह सबसे पहले इतिहास के पीरियड के लिये हम लोग साथ घर से साइकल पर निकलते। बातें करते हुये रास्ते का पता ही नहीं चलता था। फिर फ्री पीरियड में हम दोनों साथ कैटीन में जा बैठते।
उसके घने काले बाल, गोरा रंग, बात करने का धीमा लहजा, हंसते हुये गालों पर पडते डिम्पल सब उसे एक बेहद आकर्षक और खास बना देते थे। लडके तो थे ही उसके व्यक्तित्व से प्रभावित, लडकियां भी उससे बात करने और दोस्ती करने के बहाने खोजा करती थीं। पर वो थी सबसे अलग-थलग। एकदम सीधी-साधी। उसे ज्यादा दोस्त बनाना पसंद ही नहीं था। बात सबसे करती पर दोस्तों में सिर्फ मुझे गिनती थी। अपनी सब बातें हमें बताये बिना उसे चैन नहीं मिलता था। पर मेरे उसके अलावा भी और बहुत से दोस्त थे। अगर मैं कभी किसी और के साथ बात करने में लग जाती तो वो बस मायूस सी हो जाती पर शिकायत कभी नहीं करती। जलना या किसी की बुराई करना तो मानों उसके स्वभाव में ही नही था। पढने में भी बहुत अच्छी थी। इतिहास और इक्नामिक्स जैसे विषयों के साथ भी उसके फर्स्ट क्लास मार्क्स बने हुये थे।
फर्स्ट ईयर खत्म होने पर छुटिट्यों में हमारा एक दूसरे के घर आना-जाना बढ गया, और दोस्ती भी कुछ और गहरी हो गई। मेरे किराये के घर में तो हमें जगह नहीं मिलती थी बतियाने के लिये। इसलिए हम लोग ज्यादातर उसके घर में मिलते। उसका कमरा उसी की रुचि के अनुरूप बहुत ही सादा संवारा हुआ पर बहुत ही सुकून देने वाला था। वो कभी हमसे आइल पेंटिग सीखती कभी क्छ कढाई करना। बहुत ही जल्दी सबकुछ सीख जाती।
उसकी मम्मी एक बुटीक चलातीं थी और मेरी कलात्मकता से बहुत प्रभावित रहतीं थी। उनमें और प्रियंका में पर बहुत अंतर था। वो थीं पूरी बिजनेस माइंडेड और प्रियंका को बनावट या झूंठ कहीं छू कर भी नहीं गया था। वो अपने बडे-भाई और बहन से बिल्कुल अलग थी। एक दिन आंटी ने यूं ही मजाक में कहा था, "सोनिया! तू पंजाबी होती तो अपने शेखर की शादी तुझसे ही कर देती। मेरे बुटीक को कोई संभालने वाला मिल जाता।" आंटी की बात मुझे बहुत बुरी लगी पर क्या जवाब देते। तभी देखा सामने से से शेखर भइया जा रहे हैं। उनकी मुस्कुराहट से साफ पता चल रहा था कि उन्होंने आंटी की बात सुन ली है।
प्रियंका को भी ये सब अच्छा नहीं लगा। बोली, "मम्मी क्या फालतू की बात करती रहती हो।" और हम उठ कर उसके कमरे में आ गये। उसके बाद से मेरा उसके घर जाना कम हो गया। वो खुद ही मुझे न बुलाकर मेरे घर आ जाती।
कालेज खुलने पर तो बस पूरा दिन साथ ही बीतता। पता ही नहीं चला कब वक्त पंख लगाकर उड गया और हम लोग ग्रेजुयेट हो गये। मैंने इतिहास में एम ए के लिये दूसरे कालेज में एड्मिशन लिया और प्रियंका ने उसी कालेज में इक्नामिक्स में एम ए की पढाई जारी रखी। हमारी दोस्ती पहले के जैसी ही कायम थी। इसी बीच उसकी बहन की शादी तय हो गई। हमने पंजाबी शादी की हर रस्म में बढ चढ कर भाग लिया। कितने सुहाने दिन थे वो पूरी दुनिया अपनी मुठ्ठी में लगती थी।
प्रियंका की दीदी की शादी के कुछ दिन बाद ही वो किसी काम से मेरे घर आई थी। मेरा मौसेरा भाई भी उस दिन आया हुआ था जिसे हांथ देखना आता था। उसकी बताई कोई बात कभी गलत नहीं निकलती थी। प्रियंका को मैंने उसके बारे में पहले भी बताया हुआ था। उस दिन हमेशा अजनबियों के सामने गम्भीर बनी रहने वाली प्रियंका मेरे पीछे पड गई कि आज मेरा हांथ भी दिखवा दो। और उसका हांथ देखकर हमेशा मुंह पर ही अच्छा बुरा बोल देने वाले मेरे भाई ने चुप्पी साध ली। बहुत पूंछने पर भी उसने प्रियंका के सामने कुछ नहीं कहा। बाद में उसके जाने के बाद बोला, "इस प्यारी सी लडकी को प्यार में हमेशा धोखा मिलेगा। कभी खिल कर जी नहीं पायेगी बेचारी।" मैंने हमेशा की तरह उसकी बात को हंसी में उडा दिया और कहा, "अच्छा हुआ तुमने उसके सामने कुछ नहीं कहा। वो तो जरा सी बात को दिल से लगा कर बैठ जाती है। बेचारी तुम्हारी बात से ही कुम्हला जाती। "
बाद में प्रियंका बार-बार पूंछती रही कि क्या बताया तुम्हारे भाई ने हमारा भविष्य । मैंने हर बार उसकी बात टाल दी। बस एक बार कहा,"प्रियंका तुम किसी से प्यार मत करना।"
मेरी बात पर वो खिलखिला कर हंस पडी। बोली, "पागल हो क्या? इतने दिनों में बस इतना ही समझ पाई हो अपनी सहेली को। मुझे अपने मां- पापा की इज्जत जान से प्यारी है। पापा कभी भी प्रेम विवाह के लिये राजी नहीं होंगे। तो मैं प्रेम कैसे कर सकती हूं। जिस राह जाना नहीं, उसके कोस क्या गिनना।"
हम मैं उसका हंसता हुआ चेहरा देखती ही रह गयी और मन ही मन अपने आप को समझाया कि कौन इतनी प्यारी शख्सियत को प्यार नहीं कर बैठेगा। जो भी इसकी राह में कांटे ले कर आयेगा उसको ये फूल सी लडकी अपना बना लेगी।