बातें जो दिल से निकलीं ...पर ज़ुबां तक न पहुंची ...बस बीच में ही कहीं कलम से होती हुयी पन्नों पर अटक गयीं... यही कुछ है इन अनकही बातों में...
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Saturday, February 18, 2017
Tuesday, January 31, 2017
Monday, January 23, 2017
Saturday, September 24, 2016
कार की ज़रूरत
ज़िन्दगी आजकल ग्यारह नंबर की गाड़ी पर आ गयी है। कार बाढ़ की भेंट चढ़ चुकी है... इससे पहले कभी सोंचा नहीं था कि कार इतनी ज़रूरत की चीज़ है.... सालों पहले हमारे छोटे से शहर में तो कार विलासिता की चीज़ हुआ करती थी..... पता ही नहीं चला कब ये ज़रूरत की चीज़ बन गयी....स्कूटर चलाना आता तो है पर हम ट्रैफिक में कभी भी इसे नहीं चला पाते....कार ही अपनी साथी थी....और अब घर से निकलने से पहले दस बार सोंचते हैं....ज्यादातर चीजें Amazon और Big Basket से आ रही हैं....एक posotive thought बस यही है कि शायद चल-चल कर थोड़ा वजन ही कम हो जाय :-)
Saturday, November 21, 2015
बारिश के बाद..........
आज करीब दो हफ़्तों के बाद खिली निखरी धूप निकली है। इतनी तेज कि आँखों को चुभ रही है। नीले आसमान में सफेद बादलों के टुकड़े टंगे हुए हैं जैसे कि किसी ने बारिश के बाद धूप देखकर ढेर सारे कपडे सुखाने को डाल दिये हों।
लोग अपने घरों को वापस लौट रहे हैं। river view enclave में जहां दो दिन पहले नाव चल रही थी, आज लोग पैदल चल कर माहौल का जायज़ा ले रहे हैं। दीवारों पर पानी उतरने के बाद की चित्रकारी देख रहे हैं। घरों के सामने पुराने बिस्तर, तकिये, कपडे और भी न जाने क्या क्या कूड़े के ढेर में पड़ा है, पानी ने किसी को नहीं को बक्शा है। अडयार नदी में पानी कुछ नीचे उतर गया है पर नदी अभी भी पूरे वेग से बह रही है। हम सब को अहसास कराती हुयी कि प्रक्रति के आगे मनुष्य की ताकत कुछ भी नहीँ है।
लोग अपने घरों को वापस लौट रहे हैं। river view enclave में जहां दो दिन पहले नाव चल रही थी, आज लोग पैदल चल कर माहौल का जायज़ा ले रहे हैं। दीवारों पर पानी उतरने के बाद की चित्रकारी देख रहे हैं। घरों के सामने पुराने बिस्तर, तकिये, कपडे और भी न जाने क्या क्या कूड़े के ढेर में पड़ा है, पानी ने किसी को नहीं को बक्शा है। अडयार नदी में पानी कुछ नीचे उतर गया है पर नदी अभी भी पूरे वेग से बह रही है। हम सब को अहसास कराती हुयी कि प्रक्रति के आगे मनुष्य की ताकत कुछ भी नहीँ है।
Wednesday, December 01, 2010
काहे को ब्याही बिदेस...
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| पापा-मम्मी |
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| Family photograph |
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| पापा-मम्मी बैंगलौर में... |
आज ये सब बातें हम इसलिए सोंचने बैठे हैं क्योंकि हम अपने मम्मी पापा को बहुत याद कर रहे हैं| पता नहीं क्यों उन्हें इतना याद करने पर भी हम उनसे फोन पर बात नहीं कर पाते| पिछले करीब दो महीने वो लोग हमारे साथ बैंगलौर में थे| वो दो महीने उनके साथ कैसे बीत गए पता ही नहीं चले| वेंकट यू एस गए हुए थे...हमने ये सारा वक्त मम्मी पापा के साथ ऐसे गुज़ारा जैसे शादी से पहले रहते थे| मम्मी ने पूरा किचन संभाल लिया था | रोज़ दोपहर -शाम को गरम- गरम खाना तो जैसे भूल गए थे| खुद बना कर खाने में वो मज़ा कहाँ है जो माँ के हाँथ के बनाए खाने में है| मम्मी पापा की वजह से ही अपना इतने दिनों का बिसराया शौक फिर से शुरू कर दिया| घर -ग्रहस्थी के चक्कर में हम जो क्राफ्ट बिलकुल भूल गए थे वो उन लोगों के कहने से फिर शुरू कर दिया| कोई भी नयी चीज़ बना कर उन लोगों को दिखाने में कितना अच्छा लगता था| और पापा हमेशा तारीफ़ करने के साथ expert comment देना नहीं भूलते थे|
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| My Dashing Papa |
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| हमारी शादी.. |
आज उन लोगों को वापस गए तीन हफ्ते हो गए हैं| जिंदगी पहले जैसी कल रही है पर दोपहर में जब अकेले खाना खाने बैठते हैं तो न चाहते हुए भी आंसू आ जाते हैं| पेट भी नहीं भरता, रात को फिर बच्चों के और वेंकट के साथ खाकर पेट भरता है|
I really miss you papa- mummy!
काश आप हमेशा हमारे पास रह सकते|
Monday, September 20, 2010
...एक अनकही कहानी!
लिखना कभी उसका पैशन हुआ करता था.. कुछ लिखे बिना उसे जीना नहीं आता था, लिखना जैसे की उसके लिए सांस लेना जैसा था. कुछ कविता या नज़्म नहीं तो डायरी या फिर यूँ ही बेलौस बस लिखे जाना उसकी आदत सी थी. अगर वो कुछ पढ़ती भी तो उसकी कलम उसके साथ होती थी. किताब पर वो कुछ नहीं लिखती थी पर उसकी साफ़ शफ्फाक किताबों में रक्खी छोटी छोटी पर्चियों में उसकी समझ के अनुसार वो किताब पढ़ी जा सकती थी. उसके पर्स में हमेशा एक सफ़ेद पन्ना और एक कलम जरुर होती थी. पर अपने लिखे हुए को वो संभाल कर नहीं रखती थी ये भी उसकी सभी अजीब आदतों सी एक आदत थी. अपनी आदतों में बंधी हुई थी, और अपनी आदतों से अलग कुछ करने में वो परेशान हो जाती थी, झुंझला जाती थी. एक बंधे बंधाये रूटीन में उसकी ज़िन्दगी चलती थी. बस इसी तरह जीना उसे आता था.....
और फिर एक दिन उसकी ज़िन्दगी ने करवट ली, वक्त की डाली पर एक नयी कोंपल नए मौसम के साथ यूँ उगी की पूरी फिजा ही बदल गयी. मुस्कुराहटों के मौसम छा गए. अब अपनी खुली किताब सी ज़िन्दगी वो छिपाने लगी. उसे लगता की उसके जज्बे कोई उसके चहरे पर ही न पढ़ ले. और लिखना तो बस यूँ ही बंद हो गया. अब वो पढ़ती भी तो कुछ लिखती नहीं की कोई कुछ अंदाजे न लगा ले. यूँ सबसे सब कुछ छिपा कर रखना भी उसकी आदत सी हो गई..अब वो सपनों में जीती थी, उसके ख़्वाब उसकी अमानत थे..और वो अपने ख़्वाबों की दुनिया की शहजादी थी..अब वो लिखती नहीं थी, अपने शब्दों को खुद जीती थी, वो एक जीती जागती कहानी बन गयी थी....एक अनकही कहानी!
Thursday, August 26, 2010
.बस यूँ ही ..
अब तो ऊब हो गए बादलों की आँख मिचौली से..वैसे सब बैंगलौर के मौसम की तारीफ़ करते नहीं थकते ..हमें भी ये रूमानी सा मौसम बहुत भाता है....पर आज कल पता नहीं ये मौसम उदास सा लगने लगा है...सब कुछ सीला -सीला सा लगता है..पिछले साल पुराने घर में अपनी पुरानी दोस्तों के साथ समय पंख लगा कर उड़ जाता था..पर यहाँ नई जगह नया माहौल सबकुछ अजनबी सा लगता है ...हम वैसे भी दोस्त बनाने में बहुत कच्चे हैं.. बहुत वक्त लगाते हैं दोस्त बनाने में ... तो बस इंतज़ार है एक खिली खिली सी सुबह का खिले हुए सूरज का.. खुले हुए दिन का ..ये ऊबन तो टूटे कम से कम ....
...और मन के मिजाज़ से मेल खाती एक गुलज़ार की नज़्म...
...और मन के मिजाज़ से मेल खाती एक गुलज़ार की नज़्म...
सांस लेना भी कैसी आदत है
जिए जाना भी क्या रवायत है
कोई आहट नहीं बदन में कहीं
कोई साया नहीं है आँखों में
पाँव बेहिस है, चलते जाते हैं
इक सफ़र है जो बहता रहता है
कितने बरसों से कितनी सदियों से
जिए जाते हैं, जिए जाते हैं
आदतें भी अजीब होती हैं.
Tuesday, August 10, 2010
बशीर बद्र की एक ग़ज़ल

आज यूं ही किताबो की अलमारी साफ़ करते हुये किताबे उलट पलट रहे थे कि बशीर बद्र की इस खूबसूरत गज़ल पर नज़र अटक गई. सोंचा आप सब के साथ बांट ले.
वो शाख है न फूल, अगर तितलियां न हों
वो घर भी कोई घर है जहां बच्चियां न हों
पलकों से आंसुओं की महक आनी चाहिये
खाली है आसमान अगर बदलियाँ न हों
दुश्मन को भी खुदा कभी ऐसा मकां न दे
ताज़ा हवा की जिसमें कहीं खिड़कियाँ न हों
मैं पूछता हूँ मेरी गली में वो आए क्यों
जिस डाकिये के पास तेरी चिट्ठियां न हों
--बशीर बद्र
Wednesday, January 20, 2010
बसंत पंचमी से जुडी बचपन की यादें

बसंत पर अभी अभी ही एक पोस्ट डाली है। पर मन अभी भी कुछ और लिखने का हो रहा है। बचपन से जुडी कितनी यादें जहन में आ जा रही हैं। सोंचते हैं उन्हीं को जोड कर कुछ पोस्ट सा बना दें।
बचपन में बसंत पंचमी पर घर में एक उत्सव का सा माहौल होता था। ये दिन हमारे पर दादाजी श्री रामचन्द्र जी का जन्मदिन होता है। और हमारे यहां बहुत धूम-धाम से मनाया जाता है। हम सभी सुबह से ही पीले-बसंती कपडे पहन कर तैयार हो जाते थे। ये पूरा दिन हम लोग उनकी समाधिस्थल पर मनाते थे।
ये दिन बहुत ही शुभ माना जाता है। हमें याद है अगर किसी बच्चे के कान छिदवाने हों तो बसंत के दिन ही चांदी की बालियों से कान छेदे जाते थे। हमारे कान भी बसंत के दिन ही शायद जब हम तीन साल के रहे होंगे तब छेदे गये थे। कुछ ज्यादा याद नहीं है बस इतना याद है कि हम बहुत रोये थे तब।
और हां बसंत के दिन तो पतंगो से आसमान पटा रहता था। अब भी शायद वहां ऎसे ही बसंत मनायी जाती होगी। हमारी यादों में तो वो दिन ऎसे ही सहेजे हुये रखे हैं।
Tuesday, January 19, 2010
एक हाइपर्लिंक्ड लम्हा
ज़िन्दगी में कुछ लम्हे हाइपर्लिंक्ड से होते है....
बस एक जरा सी क्लिक के साथ एक नया सफ्हा खुल जाता है.................
और कभी कभी लिक नहीं भी खुलता, और पेज नाट फाउन्ड का बोर्ड आ जाता है.......
बार-बार क्लिक करने पर भी कुछ याद नहीं आता.......
पता नहीं क्या लिखना था और क्या लिख रहे हैं,
फिर कभी
बस एक जरा सी क्लिक के साथ एक नया सफ्हा खुल जाता है.................
और कभी कभी लिक नहीं भी खुलता, और पेज नाट फाउन्ड का बोर्ड आ जाता है.......
बार-बार क्लिक करने पर भी कुछ याद नहीं आता.......
पता नहीं क्या लिखना था और क्या लिख रहे हैं,
फिर कभी
Monday, September 07, 2009
वापसी

वक्त कैसे पंख लगा कर तेजी से उड जाता है पता ही नहीं चलता। अपनी पिछली पोस्ट करीब तीन साल पहले लिखी थी। सोंचो तो लगता है जैसे कल ही की बात है।हमारी नन्ही कली (जिसकी वजह से हमने इस ब्लाग से विराम लिया था) ने प्ले स्कूल जाना शुरु कर दिया है और हमें कुछ वक्त अपने लिये मिलना शुरु हो गया है। पिछले कई दिनों से हिन्दी ब्लाग जगत में आये नये (जो अब नये नहीं रहे) लोगों को और पुराने दिग्गजों को पढने में लगे थे। कुछ पढ पाया है और कुछ अभी बाकी है। हिन्दी ब्लाग जगत सच काफ़ी आगे निकल चुका है। प्रतिभा की कहीं कोई कमी नहीं है। इतना कुछ खूबसूरत पढने को मिल रहा है कि बस डूब कर पढने में वक्त कहां चला जाता है पता ही नहीं चलता। कोशिश करेंगे कि अब जुडे रहें यहां से, और साथ ही कुछ नया लिखे भी।
Tuesday, November 07, 2006
हमारी नई कृति और एक लम्बी अनुपस्थिति की वजह
Wednesday, November 16, 2005
मौसम की पहली बर्फ....
आखिर सर्दियां आ ही गईं। इस बार मौसम नये नये रंग दिखा रहा है। नवम्बर में भी कभी कभी गर्मी का सा अहसास हो रहा था। पतझड़ भी कितनी देर से आया इस बार, और कुछ रंग-बिरंगे पत्ते तो अभी भी पेड़ों पर बाकी हैं। और आज सुबह उठ कर खिड़की से बाहर देखा तो बर्फ पड़ रही थी। तापमान देखा तो 25 डिग्री फारेन्हाइट; शून्य से भी कुछ डिग्री नीचे। हां इसे भारी हिम्पात तो नहीं कह सकते, पर बर्फ तो है ही। नया-नया सब कुछ कितना अच्छा लगता है। सुबह कान्ती को स्कूल छोड़ने गये तो सब कुछ एक हल्की सी धुंध में ढका सा था। बर्फ रुई के सफेद फाहों सी उड़ती हुई विन्ड स्क्रीन पर आकर टकरा रही थी और एक पल में ही पिघल कर बही जा रही थी। जगजीत सिंह की गज़लें सुनते हुये बाहर के मौसम का मजा लेना कितना सुखद लग रहा था। मौसम की ये पहली बर्फ इतनी अच्छी लग रही है, पर कुछ ही दिन में इस से ऊब जायेंगे। जब चारों तरफ बस सफेदी का साम्राज्य सा छा जायेगा, तो यही बर्फ दुश्मन सी लगेगी। और हम फिर से बेसब्री से इंतज़ार शुरु कर देंगे- गर्मियों का।
यही तो है जीवन- जो पास नहीं है हमेशा मन वही मांगता है, और जो पास है उस की कोई कद्र नहीं।
एक तस्वीर पिछले साल की बर्फ से
यही तो है जीवन- जो पास नहीं है हमेशा मन वही मांगता है, और जो पास है उस की कोई कद्र नहीं।
एक तस्वीर पिछले साल की बर्फ से
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