Showing posts with label संस्मरण. Show all posts
Showing posts with label संस्मरण. Show all posts

Wednesday, December 01, 2010

काहे को ब्याही बिदेस...

पापा-मम्मी
Family photograph
पापा-मम्मी बैंगलौर में...
आज यूँ ही जाने क्यों जीवन के जाने अनजाने कितने ही रिश्तों के बारे में सोंचने बैठ गए हैं| अजीब होते हैं न ये रिश्ते भी...क्यों बनते हैं, कैसे बनते हैं और कैसे जीवन की हर एक डगर पर नए-नए रूप लेते रहते हैं|  हम सोंच रहे हैं उस रिश्ते के बारे में जो जन्म से पहले ही बंध जाता है- एक बच्चे का उसके माता-पिता से रिश्ता| कहीं पढ़ा था की आत्मा खुद चुनती है अपने नए जन्म में अपने माँ-बाप को| ये रिश्ता होता ही है ऐसा गहरा.. एक माँ  के लिए उसका बच्चा उसकी दुनिया होता है और बच्चे के लिए उसकी दुनिया उसकी माँ तक ही सीमित होती है| पर जैसे जैसे बच्चा बड़ा होता जाता है उसकी दुनिया उसके साथ ही बढती जाती है|

 आज ये सब बातें हम इसलिए सोंचने बैठे  हैं क्योंकि  हम अपने मम्मी पापा को बहुत याद कर रहे हैं| पता नहीं क्यों उन्हें इतना याद करने पर भी हम उनसे फोन पर बात नहीं कर पाते| पिछले  करीब दो महीने  वो लोग हमारे साथ बैंगलौर में थे| वो दो  महीने उनके साथ कैसे बीत गए पता ही नहीं चले| वेंकट यू एस गए हुए थे...हमने ये सारा वक्त मम्मी पापा के साथ ऐसे गुज़ारा जैसे शादी से पहले रहते थे| मम्मी ने पूरा किचन संभाल लिया था | रोज़ दोपहर -शाम को गरम- गरम खाना तो जैसे भूल गए थे| खुद बना कर खाने में वो मज़ा कहाँ है जो माँ के हाँथ के बनाए खाने में है| मम्मी पापा की वजह से ही अपना इतने दिनों का बिसराया शौक फिर से शुरू कर दिया| घर -ग्रहस्थी के चक्कर में हम जो क्राफ्ट बिलकुल भूल गए थे वो उन लोगों के कहने से फिर शुरू कर दिया| कोई भी नयी चीज़ बना कर उन लोगों को दिखाने में कितना अच्छा लगता था| और पापा हमेशा तारीफ़ करने के साथ expert comment देना नहीं भूलते थे|

My Dashing Papa
क्यूँ ऐसा होता है की शादी करने के बाद लड़कियों को घर छोड़कर जाना पड़ता है|  वैसे तो लडके भी आजकल अपने माता-पिता के साथ नहीं रहते| पर उनकी मजबूरी लड़कियों जैसी नहीं होती| आज पता नहीं क्यों हम इतना भावुक हो रहे हैं| अपनी शादी के बाद की विदाई याद आ रही है; जो कि बिलकुल भी नार्मल विदाई जैसी नहीं थी| पापा की वजह से ही हमारी शादी एक अध्यात्मिक समारोह में हुई थी| हमारे गुरु जी ने हमारे लिए जाती, भाषा, प्रदेश इन सबों से परे हमारे लिए वेंकट को चुना था| शादी हुई थी कलकत्ता में, हम थे फतेहगढ़ से, ससुराल थी हैदाराबद में, और पति देव रहते थे मिशिगन यू एस में. विदाई भी बहुत कन्फ्यूज्ड सी थी| रेलवे स्टेशन पर पापा कि वापसी कि ट्रेन थी प्लेटफार्म नम्बर १० पर और हमारी ट्रेन थी २ नम्बर पर| पापा स्टेशन पर पहले ही पहुँच चुके थे, और हम लोग ट्रैफिक के चलते लेट हो चुके थे| किसी तरह भागते दौड़ते पापा कि ट्रेन तक पहुंचे, कुछ बात भी नहीं कर पाए थे कि ट्रेन ने सिग्नल दे दिया| हमेशा से ही हम इतना शर्मीले थे कि पापा मम्मी तक से गले नहीं लग पाए| आज इसे लिखते हुए आँखे भर आई हैं|  अपनी अंतरजातीय, अन्तर्प्रदेशीय शादी पर हमें यूँ तो बहुत गर्व है,सात फेरे न होने का कोई अफसोस नहीं  पर आज भी पारंपरिक विदाई न होने का हमें अफसोस है|  काश अपने पापा- मम्मी से विदा होते हुए हम बिलख-बिलख के रो लिए होते तो मन में ये हमेश फांस सी न चुभती|  अब भी जब पापा -मां हमारे घर से जा रहे होते हैं, या हम फतेहगढ़ से आ रहे होते हैं तो हम अपनी भावनाए खुल कर दिखा  नहीं पाते| उनके सामने रोना छुपाते रहते है और बाद में अकेले में मन का गुबार निकलता है|

हमारी शादी..

आज उन लोगों को वापस गए तीन हफ्ते हो गए हैं|  जिंदगी पहले जैसी कल रही है पर दोपहर में जब अकेले खाना खाने बैठते हैं तो न चाहते हुए भी आंसू आ जाते हैं| पेट भी नहीं भरता, रात को फिर बच्चों के और वेंकट के साथ खाकर पेट भरता है|


I really miss you papa- mummy!
काश आप हमेशा हमारे पास रह सकते|

Wednesday, January 20, 2010

बसंत पंचमी से जुडी बचपन की यादें



बसंत पर अभी अभी ही एक पोस्ट डाली है। पर मन अभी भी कुछ और लिखने का हो रहा है। बचपन से जुडी कितनी यादें जहन में आ जा रही हैं। सोंचते हैं उन्हीं को जोड कर कुछ पोस्ट सा बना दें।

बचपन में बसंत पंचमी पर घर में एक उत्सव का सा माहौल होता था। ये दिन हमारे पर दादाजी श्री रामचन्द्र जी का जन्मदिन होता है। और हमारे यहां बहुत धूम-धाम से मनाया जाता है। हम सभी सुबह से ही पीले-बसंती कपडे पहन कर तैयार हो जाते थे। ये पूरा दिन हम लोग उनकी समाधिस्थल पर मनाते थे। वहीं पर चूल्हा जलाकर तहरी बनाई जाती थी। गोबर के उपलों पर हम लोग आलू और शक्करकंदियां भूनते थे। भुने हुये आलू और हरे धनिया की खट्टी चटनी! अब ऎसा स्वाद कहां मिलता है। शांतिपाठ के बाद पीली बूंदी का पर्शाद चढता था।

ये दिन बहुत ही शुभ माना जाता है। हमें याद है अगर किसी बच्चे के कान छिदवाने हों तो बसंत के दिन ही चांदी की बालियों से कान छेदे जाते थे। हमारे कान भी बसंत के दिन ही शायद जब हम तीन साल के रहे होंगे तब छेदे गये थे। कुछ ज्यादा याद नहीं है बस इतना याद है कि हम बहुत रोये थे तब।

और हां बसंत के दिन तो पतंगो से आसमान पटा रहता था। अब भी शायद वहां ऎसे ही बसंत मनायी जाती होगी। हमारी यादों में तो वो दिन ऎसे ही सहेजे हुये रखे हैं।

Thursday, January 14, 2010

दूरदर्शन और मिले सुर मेरा तुम्हारा....


पिछले पांच- छ: महीनों से हमने टीवी केबिल कटवाया हुआ है। बच्चे हर वक्त टीवी देखने की जिद करते थे और हमें हमेशा लगता था कि ये सब सही नहीं है उनके नन्हें दिमाग के लिये। यही सोंच कर हमने ये कदम उठाया। दिन अच्छे गुज़र रहे थे बिना टीवी के। कभी कभार वीक एंड पर कुछ मूवी देख ली या बच्चों के लिये कुछ उनकी उम्र के अनुसार लगा दिया। तभी एक मित्र (जिनके घर भी केबिल नहीं है) ने बताया कि सौ रुपये में एक एंटीना मिलता है जिससे सिर्फ दूरदर्शन देखा जा सकता है। हमने सोंचा कि शायद दूरदर्शन अच्छा रहेगा कभी-कभी बच्चों के लिये और अपने लिये भी। बस अब एंटीने की खोज शुरु हो गई। कितनी ही दुकानों पर पूंछा, सब मुस्कुरा कर कहते, "आजकल के जमाने में दूरदर्शन कौन देखता है।"

खैर कई हफ्तों की खोज के बाद एक दुकान वाले ने ये ऎंटीना मंगवा ही दिया। हमने बडी खुशी के साथ एंटीना एंस्टाल किया। ट्रांस्मीशन इतना साफ नहीं था, फिर भी काम चलाऊ पिक्चर आ ही गई। पिछले दिनों बांग्ला देश और श्री लंका सीरीज़ के तहत हमारे पतिदेव ने अपने पूर्वप्यार क्रिकेट के साथ कुछ पल गुजारे। हां बच्चों को कुछ नहीं मिला अपनी पसंद का क्योंकि सुबह शाम तो क्न्नड दूरदर्शन ही आ रहा है।

आज हमें खाली वक्त मिला ता टीवी आन किया(यूं तो टीवी देखना भूल सा गये थे) तो चिरपरिचित संगीत सुनाई दिया। "मिले सुर मेरा तुम्हारा...तो सुर बने हमारा.." मन खुश हो गया। पूरे एलर्ट हो कर बैठ गये और गीत की एक एक पंक्ति, एक एक द्रष्य को फिर से जिया। कांती को बुलाया , "देखो ये गाना जब हम छोटे थे तब भी आता था।" उसने आकर एक झलक देखा और ओके कहकर वापस अपने खेल में रम गई। और हम पता नहीं कितने साल पुरानी यादों में पहुंच गये। पता नहीं कितने सालों से ये गीत दूरदर्शन की पहचान बना हुआ है। कितना अच्छा लगा इस गीत के साथ बचपन की गलियों में एक बार फिर से झांकना। अपने बचपन के कितने सीरियल एकदम से याद आ गये। सिग्मा, इंद्र्धनुष, कच्ची धूप, नीव, फाइटर फेने और भी जाने क्या कया। हम सब रविवार का कितनी बेसब्री से इंतज़ार करते थे। और अपना सब काम निबटा कर बैठ जाते थे टीवी के सामने। और ऎसे में गर्मी के दिनों में पावर कट कितना रुलाता था। कितने खूबसूरत दिन थे। पर शायद हमारे मम्मी पापा को कभी सोंचना नहीं पडा होगा कि होगा कि ये कार्यक्रम हमारे बच्चों के लिये ठीक है भी कि नहीं। बस रविवार को ही अपने पसंदीदा सीरीयल देख कर हम लोग खुश हो जाया करते थे और सारे हफ्ते उसी की बातें होती थीं।

और आजकल अनगिनत टीवी चैनलों पर अनगिनत सीरियलों में क्या परोसा जा रहा है, उसका लेखा जोखा कौन रख सकता है। हमेशा ये डर सा लगा रहता था कि पता नहीं बच्चे जो कुछ टी्वी पर देख रहे हैं वो उनके विकास के लिये ठीक है भी कि नहीं। आदत सी पड गई थी बच्चों के साथ बैठ कर कर टीवी देखने की। अचरज होता था देख कर जरा जरा से बच्चों में पवित्र स्नेह की भावना को लाल रंग के दिल बना कर उसे रोमांस का नाम दे दिया जाता है। और मार-पिटाई भी कितनी होती इन प्रोग्राम्स में। चाहें वो टाम अन्ड जेरी हो या कोई चीनी जापानी हिन्दी/अंग्रेजी में अनुवादित सीरियल शिनचैन, निंजा हथौडी, परमैन या ऎसा ही कुछ और। बच्चे इन कार्यक्रमों को देख कर लगता है जैसे जल्दी बडे हुये जा रहे हैं। हमने अपने पडोस में मांओं को बात करते सुना है कि हमारा बच्चा तो अब डोरा से ग्रेजुयेट हो कर परमैन पर आ गया है। या "हमने अपनी बेटी को अब डिज़नी चैनल पर 'हैना मोंन्टेना' देखना अलाउ कर दिया है। आखिर वो दस साल की हो गई है। उसकी सब फ्रेंड्स देखती हैं तो वो लैफ्ट आउट फील करती है। शी इज़ आलमोस्ट अ टीन एज़र नाउ।"

पता नहीं क्यों हम ऎसी बातों में कभी प्रतिभागी नहीं बन पाये। हम तो खुश हैं कि हमारे घर केबिल नहीं है। हमारी आठ साल की बिटिया भी टीवी देखने की जिद करती है। पर हम उसे किसी न किसी तरह समझा देते हैं और हमारी लायब्रेरी में आये दिन ही एक नयी किताब का इजाफा होता है। जब बाकी सारे बच्चे बुद्धू बक्से के सामने बिना हिले-डुले बैठे होते हैं, तब हमारी दोनों बेटियां कुर्सियों के इर्द-गिर्द चादरें तान कर घर बना रही होती हैं। उस वक्त दोनों क्या मज़ेदार बातें करती जाती हैं। टीन एज़ से बहुत दूर हमारे बच्चे बचपन की गलियों मे विचरण कर रहे हैं। लगता है दोनों का कुछ झगडा हो गया है। चलते हैं.....आसान नहीं है वैसे दोनों का झगडा निपटाना।
(चित्र गूगल से साभार)

Friday, November 18, 2005

यादें बचपन की.....

आज ऎसे ही सोंचा कि अपने बचपन को याद किया जाय। रोज़ ही सोंचते रहते हैं कुछ लिखने के लिये पर वक्त नहीं निकाल पाते, यूं लिखने को तो बहुत कुछ है। जब लिखना शुरु कर दिया है तो बचपन से खूबसूरत और क्या होगा। वैसे पुराने दिनों की याद करने बैठो तो ज्यादा कुछ याद नहीं आता, बस कुछ धुंधली, कुछ स्पष्ट थोड़ी सी यादें है। हमारी याददाश्त ज्यादा तेज नहीं है, कुछ विशेष बातें ही याद रह जाती हैं।
हमारा पहला स्कूल था भारती मान्टेसरी स्कूल! हमें याद है हम जब मम्मी के साथ वहां एड्मीशन लेने गये थे। बहुत ही ज्यादा उत्साहित थे हम स्कूल जाने के लिये। पर अगले ही दिन जब बिना मम्मी के अकेले स्कूल जाना पड़ा तो रोना शुरु हो गया था। ऎसे ही बस स्कूल जाते जाते स्कूल अच्छा लगने लगा। और जब पढना सीखा तो एकदम ही किताबी कीड़े बन गये। हर वक्त कुछ न कुछ पढते रहना हमारा प्रिय शौक बन गया। और जब हम कुछ रोचक पढ रहे होते थे तो हमें आस पास के बारे में कुछ पता नहीं होता था और न ही कुछ सुनाई पड़ता था। उन्हीं दिनों की एक घटना जब हम तीसरी क्लास में पढते थे , अब भी याद है, उसका निशान मन के साथ हांथ पर अब भी है। हुआ यूं कि हम क्लास में बैठे कोई किताब बहुत तल्लीनता से पढ रहे थे। हमारी एक सह्पाठी दीपशिखा (नाम अब भी याद है) ने अपनी पेंसिल ब्लेड से बहुत ही अच्छे से छीली। पेंसिल की नोक बहुत नुकीली और बड़ी हो गई थी और दीपशिखा हमें ये दिखाना चाहती थी, हमने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया,जब उसने कई बार टोंका तो हमने उसकी पेंसिल तोड़ दी। उसे इस पर इतना गुस्सा आया कि उसने ब्लेड हमारे हांथ पर चला दिया। इतना खून निकला कि आस पास के सब लोग डर गये, पर हमने टीचर से शिकायत नहीं की क्योंकि हमें पता था कि गलती हमारी भी है। हालांकि बाद में टीचर को पता चल गया और परिणाम स्वरूप सभी के ब्लेड जब्त कर लिये गये। चौथी क्लास तक हम उस स्कूल में पढे। उसके बाद पिताश्री ने हमारा नाम इंग्लिश मीडीयम से सीधे संस्कृत मीडीयम, यानी की सरस्वती शिशु मन्दिर में करा दिया।
सरस्वती शिशु मन्दिर की कुछ बहुत प्यारी यादें अब भी जहन में हैं। वहां का माहौल हमारे पिछले स्कूल से बिल्कुल अलग था, जिससे शुरु शुरु में थोड़ी परेशानी हुई पर बाद में हम माहौल के मुताबिक ढल गये। शिशु मन्दिर में प्रतिदिन की शुरुवात प्रार्थना, एक समारोह की तरह होती थी। सुबह पूरे एक घन्टा मैदान में बैठना होता था। प्रातःस्मरण से शुरुवात होकर गीता के श्लोक, रामायण की चौपाईयां, विभिन्न गीत और सरस्वती वन्दना और भी न जाने क्या क्या होता था। हम वन्दना प्रमुख थे और सुबह की प्रार्थना सुचारु रूप से कराना हमारा काम था। उन्ही दिनों कविताओं से पहली पहचान हुई। हम लोगों को प्रतिदिन प्रार्थना के समय एक गीत भी गवाया जाता था। उनमें से दो कवितायें अभी भी याद हैं-

उगा सूर्य कैसा कहो मुक्ति का ये,
उजाला करोड़ो घरों में न पहुंचा।
खुला पिंजरा है मगर रक्त अब भी,
थके पंछियों के परों में न पहुंचा।

और

जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाय।

हमारे एक आचार्य जी (शिशु मन्दिर में टीचर को आचार्य कहकर बुलाते हैं) थे, जिनका नाम था दिनेश चन्द्र अग्निहोत्री। वो कविता लिखा करते थे और हम लोगों को सुनाया करते थे। तब समझ में कुछ ज्यादा नहीं आता था। पर अच्छा लगता था उन्हें सुनना।
उन्हीं दिनों विद्यालय के वार्षिकोत्सव का आयोजन हुआ। जिसमें विभिन्न कार्यक्रमों में हमने बढ-चढ कर हिस्सा लिया। यहां दिनेश आचार्य जी ने एक कवि सम्मेलन का भी आयोजन कराया। जिसमें हमें महादेवी वर्मा का किरदार मिला। तब पता नहीं था कि महादेवी वर्मा कितनी बड़ी कवियत्री हैं, बस अच्छा लगता था कि हमें इतना महत्वपूर्ण रोल मिला है। तभी महादेवी जी की पहली कविता पढी जो हमें स्टेज पर सुनानी थी-

वे मुस्काते फूल नहीं
जिनको आता है मुरझाना।
वे तारों के दीप नहीं,
जिनको भाता है बुझ जाना.....

और ये अब भी हमारी पसंदीदा कविता है।
महादेवी वर्मा का रोल करने से एक बात और ये हुई की हमने कविता करना शुरु कर दिया। घर में और स्कूल में सब हमें कवियत्री कहकर चिढाते थे। और हम चिढते भी बहुत थे। पता नहीं क्यों ऎसा लगा कि हमें कविता करनी चाहिये। दो अक्टूबर आने वाली थी तो सोंचा गांधी जी के ऊपर कविता लिखना अच्छा रहेगा। और अपनी पहली कविता की कुछ पंक्तियां अब भी याद हैं-
भारत की जनता को बापू जी ने संदेश दिया
पढो लिखो और चरखा कातो यही है हमको लक्ष्य दिया।
पर भारत की जनता ने इस सबको क्या अंजाम दिया,
फैली चारों ओर अव्यवस्था आतंक का बोलबाला है,
जनता नही सुधर पाई है चरखे को अब छोड़ दिया।

और भी काफी लम्बी कविता थी पर अब याद नहीं। अब इसे याद करके हंसी आती है। पर उन दिनों बहुत गर्व होता था कि हमने कविता लिखी है। इसे बार बार पढा करते थे। उन्ही दिनों हमारे यहां बुन्देल्खन्ड विश्ववविद्यालय के वाइस चांसलर डा. बी.बी.लाल आये। पापा ने उन्हें बता दिया कि हम कविता लिखते हैं। तो उन्होंने हमारी क्लास ले ली। बोले अपनी कोई कविता दिखाओ। हमने उसी दिन इन्द्र धनुष को देखकर एक कविता लिखी थी -
सत्ताइस तारीख की शाम मेरे मन में आज भी है
जब निकला था इन्द्रधनुष आसमान में...
उन्होंने इस कविता को पढकर हमें ढेर सारे उपदेश दे डाले, कि कविता लिखना है तो अभी से सीखना होगा, कविता में लय होनी चाहिये, वगैरह वगैरह...। पता नहीं क्यों हमें उनके उपदेश अच्छे नहीं लगे और हमने कविता लिखना कुछ सालों के लिये स्थगित कर दिया। आखिर हम पांचवी क्लास में थे और भी बहुत काम थे करने को।

शिशु मन्दिर में ही एक और गीत सीखा जिसे हमारे हिसाब से राष्ट्र गान की संज्ञा मिलनी चाहिये। इसे याद करने की कोशिश कर रहे हैं पर ठीक से याद नहीं आ रहा।
आप लोगों में से किसी को याद हो तो बताइये।

सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।
हम बुलबुलें हैं इसकी ये गुलसितां हमारा।

मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।
हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा।

गोदी में खेलती हैं जिसकी हजारों नदियां।
गुलशन है जिसके दम से ----।

पर्वत वो सबसे ऊंचा हम साया आसमां का,
---


ये गीत शायद इकबाल का है। हमें ठीक से नहीं पता। आपको पता हो तो बतायें।