Saturday, December 19, 2015

वापस चेन्नई

आज वापस चेन्नई आ गये।

शहर चल तो रहा है पर थोड़ा सुस्त सा.....
चेहरे भी कुछ उदास से हैं और कुछ नाराज़ से.....                    
शिकायत कुछ 'उस' से है कुछ अपने आप से....
सिमट गया था जब शहर का दायरा तो दिल और बड़े हो गये थे.... एक पन्ना और पलट गया बस वक्त की किताब का।

Tuesday, December 01, 2015

दिसंबर

वक़्त की अंगीठी में सुलग कर, चुक गया ये साल भी 

लो फिर से आया है दिसंबर ज्यों अंत है शुरूवात भी. 

Saturday, November 21, 2015

बारिश के बाद..........

आज करीब दो हफ़्तों के बाद खिली निखरी धूप निकली है। इतनी तेज कि आँखों को चुभ रही है। नीले आसमान में सफेद बादलों के टुकड़े टंगे हुए हैं जैसे कि किसी ने बारिश के बाद धूप देखकर ढेर सारे कपडे सुखाने को डाल दिये हों।
लोग अपने घरों को वापस लौट रहे हैं। river view enclave में जहां दो दिन पहले नाव चल रही थी, आज लोग पैदल चल कर माहौल का जायज़ा ले रहे हैं। दीवारों पर पानी उतरने के बाद की चित्रकारी देख रहे हैं। घरों के सामने पुराने बिस्तर, तकिये, कपडे और भी न जाने क्या क्या कूड़े के ढेर में पड़ा है, पानी ने किसी को नहीं को बक्शा है। अडयार नदी में पानी कुछ नीचे उतर गया है पर नदी अभी भी पूरे वेग से बह रही है। हम सब को अहसास कराती हुयी कि प्रक्रति के आगे मनुष्य की ताकत कुछ भी नहीँ है।

Wednesday, November 04, 2015

नवंबर


धूप के कुछ टुकड़े टँगे हैं बादलों की डोर पे
नवंबर ने दे दी है दस्तक बहक के हर ओर से!

Thursday, October 29, 2015

"काँच के शामियाने" (रश्मि रवीजा) मेरी नज़र मे


आज बहुत दिनो बाद इस ब्लाग पर कुछ लिखने बैठे हैं, असल में ये रश्मि दी से और अपने आप से किया वादा था की उनकी लिखी किताब पर हम प्रतिक्रिया ज़रूर लिखेंगे, तो बस आज वक्त निकालकर लिखने बैठ ही गये है| रश्मि दी ने जब अपने ब्लाग "मन का पाख़ी" पर अपनी कहानियाँ लिखना शुरू किया था तो हम उनके पहले पाठकों में से थे, बड़े अधिकार से और कभी ज़िद करके उनसे और कहानियाँ लिखने की गुज़ारिश करते थे| उनसे अपनी किताब प्रकाशित करवाने का आग्रह भी करते थे| और आज जब ये उपन्यास "काँच के .शामियाने" हमारे हांत में है तो ये थोड़ी बहुत अपनी भी उपलब्धि लग रही है| यूँ इस आभासी जगत में ज़्यादा लोगों से मित्रता नहीं है हमारी पर रश्मि दी से कभी ज़्यादा बातें न करके भी एक प्यारा सा रिश्ता है जो हमें उनसे जोड़े रखता है, और आज अपनी दी की किताब प्रकाशित हुई देख कर हमारा गर्वित होना तो बनता है| रश्मि दी के इस पहले उपन्यास के प्रकाशन पर हार्दिक बधाई! हमारी दुआ है की ऐसी ढेरों किताबे हमें आने वाले समय में पढ़ने को मिलें| आप यूँ ही लिखती रहें और आपकी कलम का जादू यूँ ही चलता रहे|

तो अब आते हैं इस उपन्यास पर| इस उपन्यास का शीर्षक हमें बहुत ही उपयुक्त लगा| शामियाना चाहें कपड़े का हो या काँच का कभी स्थायी नहीं होता| लड़की के जीवन की ही तरह जो बाबुल के घर कहे जाने वाले एक शामियाने से निकलकर एक दूसरे शामियाने, जिसे पति का घर कहा जाता है, में जाती है साथी साथ निभाने वाला मिल जाए तो ये शामियाना एक पक्का स्थायी घर बन जाता है नहीं तो बन जाता है काँच का शामियाना जो ज़िंदगी की धूप को संग्रहित कर और भी मन प्राण दग्ध कर जाता है|
इस उपन्यास का समर्पण भी हमें बहुत ही सुंदर, सटीक और सारगर्भित लगा| यूँ ज़्यादातर लेखक अपनी पुस्तक के समर्पण में दुनियाभर के लोगों के नाम लिख देते है, जो कतई आकर्षित नहीं करता| पर इस उपन्यास का तीन पंक्तियों का समर्पण बहुत ही प्रभावशाली है |:-
उन सभी के नाम ,जिनकी बातें अनसुनी,अनदेखी और अनजानी रह गयीं|

उपन्यास में अध्याय के शीर्षक बहुत ही रचनात्मक और अपने आप में कुछ कहानी सी कहते लगते हैं| हर अध्याय के साथ नायिका जया का बदलता स्वरूप सामने आता है| शादी से पहले एक सामान्य चंचल सी लड़की जया पिता की मृत्यु से एक गंभीर ज़िम्मेदार लड़की में बदल जाती है, जो बिना विवाह किए अपनी माँ की देखभाल करते हुए अपना जीवन बिताना चाहती है|
अगले अध्याय में जया के विवाह के समय समाज के शक्तिशाली खोखले नियमों को वर्णन मिलता है| विवाह से पहले ही जया के ससुराल वालो के इरादों का पता चलने के बाद भी उसका विवाह वहीं होता है|

खैर कहानी के बारे में ज़्यादा न लिखते हुए अब चरित्रों पर आते है| कहानी की नायिका जया एक बहुत ही आम सी लड़की है जो बहुत उँचे सपने नहीं देखती, यथार्थ के धरातल पर रहकर समझौता करने और परिस्थिति को अनुकूल बनाने की वो भरपूर कोशिश करती है| जया के चरित्र को लेखिका ने अपनी कलम से कुछ यूँ बुना है कि उसके सुख दुख पाठक को अपने लगते है| अपने बच्चों के लिए ही जीवन जी रही जया के जीवन में एक एसा मुकाम भी आता है कि वो अपने बच्चों के साथ आत्महत्या का निर्णय ले लेती है|
जया के इस संघर्ष की ही यह कहानी है, जो बार बार आँखों को नम कर जाती है| पाठक की आँखो को भिगो देना ही एक लेखक की सबसे बड़ी सफलता है, और ये रश्मि दी ने बखूबी किया है|
एक और चरित्र जिसने हमें प्रभावित किया वो है जया की दूसरी बहन सीमा | यूँ बहुत छोटा सा रोल है उसका पर वो जया की तकलीफ़ को बिना बताए बस देख कर ही समझ जाती है
और जया के पति राजीव के चरित्र के बारे में तो हम सोचना या लिखना भी नहीं चाहते| वैसे ये भी लेखक की सफलता है की कोई पात्र इतना नापसंद लगे की उसके बारे में कुछ कहना भी नागवार लगे| कहानी इतनी अपनी आसपास की लगती है की लगता ही नहीं की कोई उपन्यास पढ़ रहे है, नायिका के साथ उसके सुख दुख में सुखी दुखी होते जब हम कहानी के सुखद अंत में पहुचते हैं तो यह अहसास भी सुखद लगता है की चलो अंधेरे के बाद रौशनी ने जया की ज़िंदगी में भी दस्तक दे ही दी|

Thursday, July 02, 2015

जुलाई


उमस भरे मौसम के संग मे लेकर आस जुलाई आई ,
बारिश के संग तुम आओगे मन में  यही दिलासा लाई

Thursday, August 21, 2014

यादों वाला आँगन

कल रात फिर वही बचपन की यादों वाला आँगन सपने में आया, और आँगन के छोर पर वो छोटी सी बगिया, जिसकी एक एक चीज़ अभी भी याद है; मेहंदी के दो पेड़, दो पेड़ गुढहल के लाल फूलों वाले, एक हरसिंगार जिसके नीचे रोज सुबह फूलों की चादर बिछ जाती थी, एक छोटा अमरूद और बीच बीच में  मौसमी फूलों और सब्जियों की क्यारियाँ| हम तीनों अपनी अपनी क्यारियाँ बाँट लिया करते थे और सुबह उठाकर सबसे पहले जाकर देखते के किसकी क्यारी में कौन सा किल्ला फूटा| 
सर्दियों की छोटी दोपहारों में इसी आँगन में धूप सेंकते हुए कोई किताब पढ़ते थे और गर्मियो की शाम से ही यहाँ पानी छिड़का कर चारपाइयों पर बिस्तर लग जाते थे, और हम देर रात तक ढेर सारे तारों के तले खुसुर-पुसुर करते हुए नींद की गोद में चले जाते थे| 
इसी आँगन की नीरवता में एक दिन मन में एक कविता ने जन्म लिया था|हमारे दिन और रात उसी आँगन में शुरू और ख़त्म होते थे| कभी किसी खिलौने या टीवी , कंप्यूटर की ज़रूरत नहीं थी हमें| जब दीदी बहन से ज़्यादा पक्की सहेली थी और भइया सबसे अच्छा दोस्त| बिना खिलौनों के दुनिया भर के खेल हमने यहीं पर खेले और पढ़ाई भी यहीं पर की. यादों में वो आँगन बहुत विशालकाय था, जहाँ हम विष-अमृत और छुआ-छुआरी खेलते थे, इसी आँगन में बैठ कर हज़ारों सपने देखे थे, और पंखों को उड़ान देनी चाही थी, तब उस आँगन को छोड़ कर जाना ही अपनी नियती लगती थी, कभी सोंचा नहीं था उस वक्त की यह आँगन एक प्यारा सा सपना बन जायगा जो हमें अक्सर सुबह की नींद से जगाएगा|आज अगर वो आँगन होता तो शायद सिकुड गया होता बाकी पूरे शहर की तरह|

Sunday, June 01, 2014

जून

तम से भरे मन के गगन में तुम दीप के जैसे जले. 

जून की इस तपन में तुम छाँव के जैसे मिले! 

Thursday, May 15, 2014

मई

चिलचिलाती धूप ले कर आ गई जबसे मई,
संग तेरे होने लगी है ज़िंदगी फिर से नई


Wednesday, December 11, 2013

नज़्म

कुछ आड़ी तिरछी  लकीरें
जो मेरी उँगलियों की राह होते हुए
पन्नों पर खिंच जाया करती थीं
और शक्ल देतीं थी किसी नज़्म को
वो होती तो मेरा एक हिस्सा ही थीं
जो मेरे होने को
एक और मानी सा देतीं थीं ......
....पर बहुत दिन हुए
ये शब्द अब उमड़ते ही नहीं ....
न लेते हैं कोई शक्ल नज़मों की
बस उदास, हैरान ठहरे रहते हैं
मन के अंदर ही
जैसे मुंतज़िर हों किसी तूफ़ान के…

कभी कभी कुछ तूफ़ान जरूरी होते हैं .

Tuesday, May 17, 2011

तेरे आने की आहट से

 
तेरे आने की आहट से
फिजायें रंग लायीं हैं|
खिले हैं फूल गुलशन में,
बहारें मुस्कुराई हैं|

शरारत की है मौसम ने
फलक से घूँघट हटाया है
चमक उट्ठी है हर सू यूँ
सुबह ओस में नहाई है|

रूह ने किये सिंगार सोलह
बदन कोरा था पर अब तक
तेरी बाहों के घेरे में ,
शाम सिंदूरी हो आई है|

Tuesday, February 08, 2011

तुझको सबकुछ ख़त में लिखना

तुझको सबकुछ ख़त में लिखना
जीस्त जैसे तेरे नाम हो लिखना

आँख नहीं हटती है तुझसे
चाँद समझकर तुझको तकना

हर एक गली जैसे तेरा घर हो
हर इक मोड़ पे ऐसे रुकना

आकर कहीं फिर जा न सको तुम
कभी तो ऐसे खुल के मिलना

तेरी याद के मौसम में फिर
ज़ख्मों का फूलों सा खिलना

अपने हांथों की रेखा में
मेरा भी कभी नाम तो लिखना

Thursday, February 03, 2011

नज्म

तेरी नज़रों के हिसार में
अब हर वक्त
कैद रहती हूँ मैं.
चाहूँ भीं तो बच नहीं सकती
कुछ ऐसे खुद को खो बैठी हूँ मैं.
तेरी रफाकत के इस आलम में
दर्द ही हासिल है बस,
तू नहीं तेरी प्यास से
दिल को लगा बैठी हूँ मैं.

Saturday, December 25, 2010

ख़्वाब

कच्ची मिटटी से थे
जो ख़्वाब  कल बनाए थे,
चलो  आज पका लें उन्हें
अपने हांथो की
गर्मी से, अपनी साँसों की तपिश से
की ख़्वाब हैं ये तो
इन्हें चाहिये बस
हांथों की नरमी और साँसों की नर्मी
नहीं मिला जो इन्हें
तेरी बाहों का सहारा
तो बह जायेंगे आंसुओं के
समंदर में.......

Wednesday, December 01, 2010

काहे को ब्याही बिदेस...

पापा-मम्मी
Family photograph
पापा-मम्मी बैंगलौर में...
आज यूँ ही जाने क्यों जीवन के जाने अनजाने कितने ही रिश्तों के बारे में सोंचने बैठ गए हैं| अजीब होते हैं न ये रिश्ते भी...क्यों बनते हैं, कैसे बनते हैं और कैसे जीवन की हर एक डगर पर नए-नए रूप लेते रहते हैं|  हम सोंच रहे हैं उस रिश्ते के बारे में जो जन्म से पहले ही बंध जाता है- एक बच्चे का उसके माता-पिता से रिश्ता| कहीं पढ़ा था की आत्मा खुद चुनती है अपने नए जन्म में अपने माँ-बाप को| ये रिश्ता होता ही है ऐसा गहरा.. एक माँ  के लिए उसका बच्चा उसकी दुनिया होता है और बच्चे के लिए उसकी दुनिया उसकी माँ तक ही सीमित होती है| पर जैसे जैसे बच्चा बड़ा होता जाता है उसकी दुनिया उसके साथ ही बढती जाती है|

 आज ये सब बातें हम इसलिए सोंचने बैठे  हैं क्योंकि  हम अपने मम्मी पापा को बहुत याद कर रहे हैं| पता नहीं क्यों उन्हें इतना याद करने पर भी हम उनसे फोन पर बात नहीं कर पाते| पिछले  करीब दो महीने  वो लोग हमारे साथ बैंगलौर में थे| वो दो  महीने उनके साथ कैसे बीत गए पता ही नहीं चले| वेंकट यू एस गए हुए थे...हमने ये सारा वक्त मम्मी पापा के साथ ऐसे गुज़ारा जैसे शादी से पहले रहते थे| मम्मी ने पूरा किचन संभाल लिया था | रोज़ दोपहर -शाम को गरम- गरम खाना तो जैसे भूल गए थे| खुद बना कर खाने में वो मज़ा कहाँ है जो माँ के हाँथ के बनाए खाने में है| मम्मी पापा की वजह से ही अपना इतने दिनों का बिसराया शौक फिर से शुरू कर दिया| घर -ग्रहस्थी के चक्कर में हम जो क्राफ्ट बिलकुल भूल गए थे वो उन लोगों के कहने से फिर शुरू कर दिया| कोई भी नयी चीज़ बना कर उन लोगों को दिखाने में कितना अच्छा लगता था| और पापा हमेशा तारीफ़ करने के साथ expert comment देना नहीं भूलते थे|

My Dashing Papa
क्यूँ ऐसा होता है की शादी करने के बाद लड़कियों को घर छोड़कर जाना पड़ता है|  वैसे तो लडके भी आजकल अपने माता-पिता के साथ नहीं रहते| पर उनकी मजबूरी लड़कियों जैसी नहीं होती| आज पता नहीं क्यों हम इतना भावुक हो रहे हैं| अपनी शादी के बाद की विदाई याद आ रही है; जो कि बिलकुल भी नार्मल विदाई जैसी नहीं थी| पापा की वजह से ही हमारी शादी एक अध्यात्मिक समारोह में हुई थी| हमारे गुरु जी ने हमारे लिए जाती, भाषा, प्रदेश इन सबों से परे हमारे लिए वेंकट को चुना था| शादी हुई थी कलकत्ता में, हम थे फतेहगढ़ से, ससुराल थी हैदाराबद में, और पति देव रहते थे मिशिगन यू एस में. विदाई भी बहुत कन्फ्यूज्ड सी थी| रेलवे स्टेशन पर पापा कि वापसी कि ट्रेन थी प्लेटफार्म नम्बर १० पर और हमारी ट्रेन थी २ नम्बर पर| पापा स्टेशन पर पहले ही पहुँच चुके थे, और हम लोग ट्रैफिक के चलते लेट हो चुके थे| किसी तरह भागते दौड़ते पापा कि ट्रेन तक पहुंचे, कुछ बात भी नहीं कर पाए थे कि ट्रेन ने सिग्नल दे दिया| हमेशा से ही हम इतना शर्मीले थे कि पापा मम्मी तक से गले नहीं लग पाए| आज इसे लिखते हुए आँखे भर आई हैं|  अपनी अंतरजातीय, अन्तर्प्रदेशीय शादी पर हमें यूँ तो बहुत गर्व है,सात फेरे न होने का कोई अफसोस नहीं  पर आज भी पारंपरिक विदाई न होने का हमें अफसोस है|  काश अपने पापा- मम्मी से विदा होते हुए हम बिलख-बिलख के रो लिए होते तो मन में ये हमेश फांस सी न चुभती|  अब भी जब पापा -मां हमारे घर से जा रहे होते हैं, या हम फतेहगढ़ से आ रहे होते हैं तो हम अपनी भावनाए खुल कर दिखा  नहीं पाते| उनके सामने रोना छुपाते रहते है और बाद में अकेले में मन का गुबार निकलता है|

हमारी शादी..

आज उन लोगों को वापस गए तीन हफ्ते हो गए हैं|  जिंदगी पहले जैसी कल रही है पर दोपहर में जब अकेले खाना खाने बैठते हैं तो न चाहते हुए भी आंसू आ जाते हैं| पेट भी नहीं भरता, रात को फिर बच्चों के और वेंकट के साथ खाकर पेट भरता है|


I really miss you papa- mummy!
काश आप हमेशा हमारे पास रह सकते|

Monday, September 20, 2010

...एक अनकही कहानी!



लिखना कभी उसका पैशन हुआ करता था.. कुछ लिखे बिना उसे जीना नहीं आता था, लिखना जैसे की उसके लिए सांस लेना जैसा था. कुछ कविता या नज़्म नहीं तो डायरी या फिर यूँ ही बेलौस बस लिखे जाना उसकी आदत सी थी. अगर वो कुछ पढ़ती भी तो उसकी कलम उसके साथ होती थी. किताब पर वो कुछ नहीं लिखती थी पर उसकी साफ़ शफ्फाक किताबों में रक्खी छोटी छोटी पर्चियों में उसकी समझ के अनुसार वो किताब पढ़ी जा सकती थी. उसके पर्स में हमेशा एक सफ़ेद पन्ना और एक कलम जरुर होती थी. पर अपने लिखे हुए को वो संभाल कर नहीं रखती थी ये भी उसकी सभी अजीब आदतों सी एक आदत थी. अपनी आदतों में बंधी हुई थी, और अपनी आदतों से अलग कुछ करने में वो परेशान हो जाती थी, झुंझला जाती थी. एक बंधे बंधाये रूटीन में उसकी ज़िन्दगी चलती थी. बस इसी तरह जीना उसे आता था.....



 
और फिर एक दिन उसकी ज़िन्दगी ने करवट ली, वक्त की डाली पर एक नयी कोंपल नए मौसम के साथ यूँ उगी की पूरी फिजा ही बदल गयी. मुस्कुराहटों के मौसम छा गए. अब अपनी खुली किताब सी ज़िन्दगी वो छिपाने लगी. उसे लगता की उसके जज्बे कोई उसके चहरे  पर ही न पढ़ ले. और लिखना तो बस यूँ ही बंद हो गया. अब वो पढ़ती भी तो कुछ लिखती नहीं की कोई कुछ अंदाजे न लगा ले. यूँ सबसे सब कुछ छिपा कर रखना भी उसकी आदत सी हो गई..अब वो सपनों में जीती थी, उसके ख़्वाब उसकी अमानत थे..और वो अपने ख़्वाबों की दुनिया की शहजादी थी..अब वो लिखती नहीं थी, अपने शब्दों को खुद जीती थी, वो एक जीती जागती कहानी बन गयी थी....एक अनकही कहानी!

Thursday, August 26, 2010

.बस यूँ ही ..

अब तो ऊब हो गए बादलों की आँख मिचौली से..वैसे सब बैंगलौर के मौसम की तारीफ़ करते नहीं थकते ..हमें भी ये रूमानी सा मौसम बहुत भाता है....पर आज कल पता नहीं ये मौसम उदास सा लगने लगा है...सब कुछ सीला -सीला सा लगता है..पिछले साल पुराने घर में अपनी पुरानी दोस्तों के साथ समय पंख लगा कर उड़ जाता था..पर यहाँ नई जगह नया माहौल सबकुछ अजनबी सा लगता है ...हम वैसे भी दोस्त बनाने में बहुत कच्चे हैं.. बहुत वक्त लगाते हैं दोस्त बनाने में ... तो बस इंतज़ार है एक खिली खिली सी सुबह का खिले हुए सूरज का.. खुले हुए दिन का ..ये ऊबन तो टूटे कम से कम ....

...और मन के मिजाज़ से मेल खाती एक गुलज़ार की नज़्म...

सांस लेना भी कैसी आदत है
जिए जाना भी क्या रवायत है
कोई आहट नहीं बदन में कहीं
कोई साया नहीं है आँखों में
पाँव बेहिस है, चलते जाते हैं
इक सफ़र है जो बहता रहता है
कितने बरसों से कितनी सदियों से
जिए जाते हैं, जिए जाते हैं

आदतें भी अजीब होती हैं.

Tuesday, August 10, 2010

बशीर बद्र की एक ग़ज़ल


आज यूं ही किताबो की अलमारी साफ़ करते हुये किताबे उलट पलट रहे थे कि बशीर बद्र की इस खूबसूरत गज़ल पर नज़र अटक गई. सोंचा आप सब के साथ बांट ले.

वो शाख है न फूल, अगर तितलियां न हों
वो घर भी कोई घर है जहां बच्चियां न हों

पलकों से आंसुओं की महक आनी चाहिये
खाली है आसमान अगर बदलियाँ न हों

दुश्मन को भी खुदा कभी ऐसा मकां न दे
ताज़ा हवा की जिसमें कहीं खिड़कियाँ न हों

मैं पूछता हूँ मेरी गली में वो आए क्यों
जिस डाकिये के पास तेरी चिट्ठियां न हों

--बशीर बद्र

Saturday, August 07, 2010

बारिश



फ़लक पर बादल घिरे हैं मौसम भी भीना-भीना है,
बारिश तो होनी ही है ये अगस्त का महीना है।