बातें जो दिल से निकलीं ...पर ज़ुबां तक न पहुंची ...बस बीच में ही कहीं कलम से होती हुयी पन्नों पर अटक गयीं... यही कुछ है इन अनकही बातों में...
Saturday, February 18, 2017
Tuesday, January 31, 2017
Monday, January 23, 2017
Saturday, January 21, 2017
कलाकार
कलाकार की कृति को सब देखते हैं,
सराहते हैं।
फ़्रेम में लगाकर दीवार पर सजाते हैं।
पर कौन समझता है
उस कलाकार के दर्द को,
जिसने सृजन की पीड़ा को सहा है।
कौन देख पता है कि कलाकार अपनी रचना में
लहू के रंग भरता है।
बस सब देखते है उसकी कृति को,
और भूल जाते हैं
कलाकार को!
Monday, January 09, 2017
Sunday, January 08, 2017
चिड़ियों सी लड़कियाँ
सारे आकाश के विस्तार को छू लेना चाहती थी...
लेकिन समाज के बहेलियों ने उसके पंख काट दिए,
और पटक दिया उसे एक अंधेरी कोठरी में....
डाल दी उसके क़दमों में बेड़ियाँ ।
पर समय बीता.... और सदियों से दबायी हुयी लड़की जाग गयी ।
पंखों की नयी कोंपले रोशनी के साथ ऐसे फूटीं कि
बहेलियों की आँखें चौंधिया गयीं....
चिड़ियों सी लड़कियाँ उड़ गयीं आँख के समाने से....
देखे अब कब तक पंख काटेंगे ये बहेलिए....
की लड़कियों ने उड़ना और
पंखों ने उगना अब सीख लिया है।
--सारिका सक्सेना
Monday, November 21, 2016
सुन्दरता की परिभाषा
Saturday, September 24, 2016
कार की ज़रूरत
ज़िन्दगी आजकल ग्यारह नंबर की गाड़ी पर आ गयी है। कार बाढ़ की भेंट चढ़ चुकी है... इससे पहले कभी सोंचा नहीं था कि कार इतनी ज़रूरत की चीज़ है.... सालों पहले हमारे छोटे से शहर में तो कार विलासिता की चीज़ हुआ करती थी..... पता ही नहीं चला कब ये ज़रूरत की चीज़ बन गयी....स्कूटर चलाना आता तो है पर हम ट्रैफिक में कभी भी इसे नहीं चला पाते....कार ही अपनी साथी थी....और अब घर से निकलने से पहले दस बार सोंचते हैं....ज्यादातर चीजें Amazon और Big Basket से आ रही हैं....एक posotive thought बस यही है कि शायद चल-चल कर थोड़ा वजन ही कम हो जाय :-)
Saturday, December 19, 2015
वापस चेन्नई
आज वापस चेन्नई आ गये।
शहर चल तो रहा है पर थोड़ा सुस्त सा.....
चेहरे भी कुछ उदास से हैं और कुछ नाराज़ से.....
शिकायत कुछ 'उस' से है कुछ अपने आप से....
सिमट गया था जब शहर का दायरा तो दिल और बड़े हो गये थे.... एक पन्ना और पलट गया बस वक्त की किताब का।
Tuesday, December 01, 2015
दिसंबर
वक़्त की अंगीठी में सुलग कर, चुक गया ये साल भी
लो फिर से आया है दिसंबर ज्यों अंत है शुरूवात भी.
Monday, November 23, 2015
Saturday, November 21, 2015
बारिश के बाद..........
लोग अपने घरों को वापस लौट रहे हैं। river view enclave में जहां दो दिन पहले नाव चल रही थी, आज लोग पैदल चल कर माहौल का जायज़ा ले रहे हैं। दीवारों पर पानी उतरने के बाद की चित्रकारी देख रहे हैं। घरों के सामने पुराने बिस्तर, तकिये, कपडे और भी न जाने क्या क्या कूड़े के ढेर में पड़ा है, पानी ने किसी को नहीं को बक्शा है। अडयार नदी में पानी कुछ नीचे उतर गया है पर नदी अभी भी पूरे वेग से बह रही है। हम सब को अहसास कराती हुयी कि प्रक्रति के आगे मनुष्य की ताकत कुछ भी नहीँ है।
Wednesday, November 04, 2015
Thursday, October 29, 2015
"काँच के शामियाने" (रश्मि रवीजा) मेरी नज़र मे
Thursday, July 02, 2015
Thursday, August 21, 2014
यादों वाला आँगन
Sunday, June 01, 2014
Thursday, May 15, 2014
Wednesday, December 11, 2013
नज़्म
जो मेरी उँगलियों की राह होते हुए
पन्नों पर खिंच जाया करती थीं
और शक्ल देतीं थी किसी नज़्म को
वो होती तो मेरा एक हिस्सा ही थीं
जो मेरे होने को
एक और मानी सा देतीं थीं ......
....पर बहुत दिन हुए
ये शब्द अब उमड़ते ही नहीं ....
न लेते हैं कोई शक्ल नज़मों की
बस उदास, हैरान ठहरे रहते हैं
मन के अंदर ही
जैसे मुंतज़िर हों किसी तूफ़ान के…
कभी कभी कुछ तूफ़ान जरूरी होते हैं .
Tuesday, May 17, 2011
Tuesday, February 08, 2011
Thursday, February 03, 2011
Saturday, December 25, 2010
ख़्वाब
जो ख़्वाब कल बनाए थे,
चलो आज पका लें उन्हें
अपने हांथो की
गर्मी से, अपनी साँसों की तपिश से
की ख़्वाब हैं ये तो
इन्हें चाहिये बस
हांथों की नरमी और साँसों की नर्मी
नहीं मिला जो इन्हें
तेरी बाहों का सहारा
तो बह जायेंगे आंसुओं के
समंदर में.......
Wednesday, December 01, 2010
काहे को ब्याही बिदेस...
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| पापा-मम्मी |
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| Family photograph |
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| पापा-मम्मी बैंगलौर में... |
आज ये सब बातें हम इसलिए सोंचने बैठे हैं क्योंकि हम अपने मम्मी पापा को बहुत याद कर रहे हैं| पता नहीं क्यों उन्हें इतना याद करने पर भी हम उनसे फोन पर बात नहीं कर पाते| पिछले करीब दो महीने वो लोग हमारे साथ बैंगलौर में थे| वो दो महीने उनके साथ कैसे बीत गए पता ही नहीं चले| वेंकट यू एस गए हुए थे...हमने ये सारा वक्त मम्मी पापा के साथ ऐसे गुज़ारा जैसे शादी से पहले रहते थे| मम्मी ने पूरा किचन संभाल लिया था | रोज़ दोपहर -शाम को गरम- गरम खाना तो जैसे भूल गए थे| खुद बना कर खाने में वो मज़ा कहाँ है जो माँ के हाँथ के बनाए खाने में है| मम्मी पापा की वजह से ही अपना इतने दिनों का बिसराया शौक फिर से शुरू कर दिया| घर -ग्रहस्थी के चक्कर में हम जो क्राफ्ट बिलकुल भूल गए थे वो उन लोगों के कहने से फिर शुरू कर दिया| कोई भी नयी चीज़ बना कर उन लोगों को दिखाने में कितना अच्छा लगता था| और पापा हमेशा तारीफ़ करने के साथ expert comment देना नहीं भूलते थे|
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| My Dashing Papa |
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| हमारी शादी.. |
आज उन लोगों को वापस गए तीन हफ्ते हो गए हैं| जिंदगी पहले जैसी कल रही है पर दोपहर में जब अकेले खाना खाने बैठते हैं तो न चाहते हुए भी आंसू आ जाते हैं| पेट भी नहीं भरता, रात को फिर बच्चों के और वेंकट के साथ खाकर पेट भरता है|
I really miss you papa- mummy!
काश आप हमेशा हमारे पास रह सकते|
Monday, September 20, 2010
...एक अनकही कहानी!
लिखना कभी उसका पैशन हुआ करता था.. कुछ लिखे बिना उसे जीना नहीं आता था, लिखना जैसे की उसके लिए सांस लेना जैसा था. कुछ कविता या नज़्म नहीं तो डायरी या फिर यूँ ही बेलौस बस लिखे जाना उसकी आदत सी थी. अगर वो कुछ पढ़ती भी तो उसकी कलम उसके साथ होती थी. किताब पर वो कुछ नहीं लिखती थी पर उसकी साफ़ शफ्फाक किताबों में रक्खी छोटी छोटी पर्चियों में उसकी समझ के अनुसार वो किताब पढ़ी जा सकती थी. उसके पर्स में हमेशा एक सफ़ेद पन्ना और एक कलम जरुर होती थी. पर अपने लिखे हुए को वो संभाल कर नहीं रखती थी ये भी उसकी सभी अजीब आदतों सी एक आदत थी. अपनी आदतों में बंधी हुई थी, और अपनी आदतों से अलग कुछ करने में वो परेशान हो जाती थी, झुंझला जाती थी. एक बंधे बंधाये रूटीन में उसकी ज़िन्दगी चलती थी. बस इसी तरह जीना उसे आता था.....
और फिर एक दिन उसकी ज़िन्दगी ने करवट ली, वक्त की डाली पर एक नयी कोंपल नए मौसम के साथ यूँ उगी की पूरी फिजा ही बदल गयी. मुस्कुराहटों के मौसम छा गए. अब अपनी खुली किताब सी ज़िन्दगी वो छिपाने लगी. उसे लगता की उसके जज्बे कोई उसके चहरे पर ही न पढ़ ले. और लिखना तो बस यूँ ही बंद हो गया. अब वो पढ़ती भी तो कुछ लिखती नहीं की कोई कुछ अंदाजे न लगा ले. यूँ सबसे सब कुछ छिपा कर रखना भी उसकी आदत सी हो गई..अब वो सपनों में जीती थी, उसके ख़्वाब उसकी अमानत थे..और वो अपने ख़्वाबों की दुनिया की शहजादी थी..अब वो लिखती नहीं थी, अपने शब्दों को खुद जीती थी, वो एक जीती जागती कहानी बन गयी थी....एक अनकही कहानी!
Thursday, August 26, 2010
.बस यूँ ही ..
...और मन के मिजाज़ से मेल खाती एक गुलज़ार की नज़्म...
Tuesday, August 10, 2010
बशीर बद्र की एक ग़ज़ल

आज यूं ही किताबो की अलमारी साफ़ करते हुये किताबे उलट पलट रहे थे कि बशीर बद्र की इस खूबसूरत गज़ल पर नज़र अटक गई. सोंचा आप सब के साथ बांट ले.
वो शाख है न फूल, अगर तितलियां न हों
वो घर भी कोई घर है जहां बच्चियां न हों
पलकों से आंसुओं की महक आनी चाहिये
खाली है आसमान अगर बदलियाँ न हों
दुश्मन को भी खुदा कभी ऐसा मकां न दे
ताज़ा हवा की जिसमें कहीं खिड़कियाँ न हों
मैं पूछता हूँ मेरी गली में वो आए क्यों
जिस डाकिये के पास तेरी चिट्ठियां न हों
--बशीर बद्र












































