रोज वही सूरज का ढलना,
नैनों में दीपक का जलना,
सदियों सी इक शाम बिताकर;
रात गये फिर उनसे मिलना।
********************************
राह देखते तेरी,
खुद राह हो गये तेरी,
इस राह की तकदीर में;
कभी तो हो अगवानी तेरी।
बातें जो दिल से निकलीं ...पर ज़ुबां तक न पहुंची ...बस बीच में ही कहीं कलम से होती हुयी पन्नों पर अटक गयीं... यही कुछ है इन अनकही बातों में...
Monday, September 19, 2005
Tuesday, September 13, 2005
बहाना...........
बहाना ढूंढ रहे थे सुबह से रोने का ;
तका जो फलक तो झङी लग के बरसात हुई।
इक अजनबी सी लङकी मेरे अन्दर रहा करती है;
देखा जो आज आईना तो उस से मुलाकात हुई।
तका जो फलक तो झङी लग के बरसात हुई।
इक अजनबी सी लङकी मेरे अन्दर रहा करती है;
देखा जो आज आईना तो उस से मुलाकात हुई।
Saturday, September 10, 2005
बारिश में
याद बहुत आई
इस बार भी
घर की बारिश में
मन को मनाया तो बहुत
पर भर आईं
आखिर अंखियां बारिश में ।
सखियां, झूले;
कागज़ की नावें,
एक साथ ही जैसे
चले आये यादों में,
नहीं रुक पाया बस
भर आया मन
इस बार भी बारिश में।
मेंहदी भी नहीं रचती
हथेलियों में यहां जैसे,
चूङियां भी कलाइयों में,
सजती हैं कहां वैसे
बस बादल ही
बरसते हैं हरबार
यहां बारिश में।
क्या कहें?
होता है यहां
हर साल यही बारिश में।
इस बार भी
घर की बारिश में
मन को मनाया तो बहुत
पर भर आईं
आखिर अंखियां बारिश में ।
सखियां, झूले;
कागज़ की नावें,
एक साथ ही जैसे
चले आये यादों में,
नहीं रुक पाया बस
भर आया मन
इस बार भी बारिश में।
मेंहदी भी नहीं रचती
हथेलियों में यहां जैसे,
चूङियां भी कलाइयों में,
सजती हैं कहां वैसे
बस बादल ही
बरसते हैं हरबार
यहां बारिश में।
क्या कहें?
होता है यहां
हर साल यही बारिश में।
Tuesday, September 06, 2005
गीत
कुछ गीत बन रहे हैं, मेरे मन की उलझनों में।
कुछ साज़ बज रहे हैं, मेरे मन की सरगमों मे॥
कुछ है जो कहा नहीं जाता, अपनी ही ज़ुबां से,
कुछ बात छिपी हुई है, मेरे मन की चिलमनों में।
अनन्त से क्षिति तक, छाई है एक खुमारी,
मय सी बरस रही है, मेघों की गरजनों में।
यामिनी बन गई है, एक अनकही सी कहानी,
ऊषा खो गई है, सन्ध्या की धङकनों में।
कुछ साज़ बज रहे हैं, मेरे मन की सरगमों मे॥
कुछ है जो कहा नहीं जाता, अपनी ही ज़ुबां से,
कुछ बात छिपी हुई है, मेरे मन की चिलमनों में।
अनन्त से क्षिति तक, छाई है एक खुमारी,
मय सी बरस रही है, मेघों की गरजनों में।
यामिनी बन गई है, एक अनकही सी कहानी,
ऊषा खो गई है, सन्ध्या की धङकनों में।
Friday, September 02, 2005
तुझसे पहचान
तुझसे हुई है पहचान जबसे
खुद से अन्जान हो गई हूं मैं
खुद से मिल के कोई थम सा जाय
ऎसे हैरान हो गई हूं मैं
तेरे नाम से ही बस दिल धङकने लगे,
तुझसे रूबरु हूं कभी तो लब कांपे
एक मुस्कुराहट सी चस्पाँ है हर वक्त
कभी हंसी के अपनी कानों में कहकहे गूंजे
कभी उदासी के आलम में खुद को डूबा देखूं
कितनी कमजोर हो गयी हूं मैं
मेरी आवाज़ मेरा साथ न दे,
मेरे हांथों में अपना हांथ न दे
सारे अल्फ़ाज़ लङखङा जायें,
जिस्मों जां जैसे थरथरा जायें
कौन समझेगा मेरी हालत को
मेरे जज़्बों को मेरी चाहत को
खुद किसी को बता नहीं सकती
तुझसे मानूस हो नहीं पाती
दूर चाहूं तो जा नहीं सकती
हर सू तुझे महसूस करती हूं मैं
वक्त की शाख पर नई कोंपल
मौसमे-गुल ने कुछ ऎसे उगाई है
जैसे जाङे की सर्द रातों में
कोई अहसास हौले से नरमाई दे
और कोई लङकी अपने दहके हुये कानों को
फ़कत अपने हांथो से छुपाना चाहे
तेरी खामोशी और बातें सुनके
हो गई हूं मैं भी एक आम सी लङकी
जो आंखे मूंदे सपनों का इंतज़ार करती है
क्यों जागी रातों को सपने देखती हूं मैं
खुद से अन्जान हो गई हूं मैं
खुद से मिल के कोई थम सा जाय
ऎसे हैरान हो गई हूं मैं
तेरे नाम से ही बस दिल धङकने लगे,
तुझसे रूबरु हूं कभी तो लब कांपे
एक मुस्कुराहट सी चस्पाँ है हर वक्त
कभी हंसी के अपनी कानों में कहकहे गूंजे
कभी उदासी के आलम में खुद को डूबा देखूं
कितनी कमजोर हो गयी हूं मैं
मेरी आवाज़ मेरा साथ न दे,
मेरे हांथों में अपना हांथ न दे
सारे अल्फ़ाज़ लङखङा जायें,
जिस्मों जां जैसे थरथरा जायें
कौन समझेगा मेरी हालत को
मेरे जज़्बों को मेरी चाहत को
खुद किसी को बता नहीं सकती
तुझसे मानूस हो नहीं पाती
दूर चाहूं तो जा नहीं सकती
हर सू तुझे महसूस करती हूं मैं
वक्त की शाख पर नई कोंपल
मौसमे-गुल ने कुछ ऎसे उगाई है
जैसे जाङे की सर्द रातों में
कोई अहसास हौले से नरमाई दे
और कोई लङकी अपने दहके हुये कानों को
फ़कत अपने हांथो से छुपाना चाहे
तेरी खामोशी और बातें सुनके
हो गई हूं मैं भी एक आम सी लङकी
जो आंखे मूंदे सपनों का इंतज़ार करती है
क्यों जागी रातों को सपने देखती हूं मैं
Tuesday, August 23, 2005
एक नज़्म

कई दिन से है कलम बंद
आज कुछ तो लिखना है।
अक्षरों की राह होते हुये
आज कुछ तो बहकना है।
चलो ढूंढे मन की सिलवटों में...
कहीं तो छिपी बैठी होगी
कोई कविता-
या कोई अधूरी सी नज़्म;
लिख दें उसे फिर से
मोतियों सी लिखावट में;
दें उसे कोई नये मायने।
नहीं तो चलो-
खारे पानी में ही डुबो दें
आज कलम
रच दें दर्द का कोई नया नग्मा;
ज़िन्दगी की किताब में
कुछ नये सफे जोङें।
दें मन के गुबार को
इक नई भाषा;
तोङ दें इस पसरे हुये मौन को
कई दिन से है
कलम बंद
आज कुछ तो लिख दें........
Wednesday, July 13, 2005
मन तितली
तितली बन मन पंख पसारे।
बिखरे रंग धनक के सारे।
शोख हवा से लेकर खुशबू;
लिख दी पाती नाम तुम्हारे।
हुई आज मैं अपने पिय की;
टंक गये आंचल चांद-सितारे।
बाबुल अंगना छूटा अब तो;
चली आज मैं पिया के द्वारे।
प्यार की पहली बारिश में ही;
डूब गया मन संग तुम्हारे।
भर नज़रों से तुमने देखा,
झुक गईं अंखियाँ लाज के मारे।
अम्बर से कुछ स्याही लेकर;
लिक्खा खुद को नाम तुम्हारे।
तुमसे मिलना बातें करना;
पल में बीते लम्हे सारे।
संग तुम्हारे निकले घर से;
बढ के कोई नज़र उतारे।
बिखरे रंग धनक के सारे।
शोख हवा से लेकर खुशबू;
लिख दी पाती नाम तुम्हारे।
हुई आज मैं अपने पिय की;
टंक गये आंचल चांद-सितारे।
बाबुल अंगना छूटा अब तो;
चली आज मैं पिया के द्वारे।
प्यार की पहली बारिश में ही;
डूब गया मन संग तुम्हारे।
भर नज़रों से तुमने देखा,
झुक गईं अंखियाँ लाज के मारे।
अम्बर से कुछ स्याही लेकर;
लिक्खा खुद को नाम तुम्हारे।
तुमसे मिलना बातें करना;
पल में बीते लम्हे सारे।
संग तुम्हारे निकले घर से;
बढ के कोई नज़र उतारे।
Monday, July 11, 2005
कहना है......
कहना है बहुत कुछ उन्हें भी लेकिन,
जाने क्यों इज़हार नहीं करते;
दिल में एक चुभन उन्हें भी है,
पर जाने क्यों अहसाह नहीं करते।
अक्सर आंखों मॆं उनकी,
कुछ सवाल लहराते देखे हैं।
अक्सर बातों में उनकी
कुछ अधूरे प्रश्न से देखे हैं;
बातें हैं दिल में लाखों
पर जाने क्यों बात नहीं करते।
कहते हैं करार उन्हें है,
पर बेकरार से दिखते हैं।
देख कर मेरी आंखे भीगी ,
कुछ बेज़ार से लगते हैं।
है कोई नहीं मेरा उनके सिवा
जाने क्यों स्वीकार नहीं करते।
अंदाज उन्हें है प्यार का मेरे,
फिर क्यूं इम्तहान सा लेते हैं
हर एक खुशी देकर जैसे
कोई अहसान सा कर देते हैं
प्यार उन्हें भी हमसे है
जाने क्यों स्वीकार नहीं करते।
जाने क्यों इज़हार नहीं करते;
दिल में एक चुभन उन्हें भी है,
पर जाने क्यों अहसाह नहीं करते।
अक्सर आंखों मॆं उनकी,
कुछ सवाल लहराते देखे हैं।
अक्सर बातों में उनकी
कुछ अधूरे प्रश्न से देखे हैं;
बातें हैं दिल में लाखों
पर जाने क्यों बात नहीं करते।
कहते हैं करार उन्हें है,
पर बेकरार से दिखते हैं।
देख कर मेरी आंखे भीगी ,
कुछ बेज़ार से लगते हैं।
है कोई नहीं मेरा उनके सिवा
जाने क्यों स्वीकार नहीं करते।
अंदाज उन्हें है प्यार का मेरे,
फिर क्यूं इम्तहान सा लेते हैं
हर एक खुशी देकर जैसे
कोई अहसान सा कर देते हैं
प्यार उन्हें भी हमसे है
जाने क्यों स्वीकार नहीं करते।
Friday, July 08, 2005
एक गज़ल
तेरी एक नज़र ने आज मुझे इस तरह सजाया है।
मिरे आगे आज तो कुछ चांद भी शरमाया है।
मांग मेरी मोती , सितारों से भर गई।
माथे पे मेरे आज महताब जगमागाया है।
लम्स ने तेरे मुझ पे जादू सा कर दिया।
हर शख्स मेरी जानिब तक के मुस्कुराया है।
एक खुनक सी बिखर गई है मौसम में ।
हवाओं ने फिर से कोई नया गीत गुनगुनाया है।
**********************************
तेरी कमगोई से पहले ही थे गिले बहुत,
चुप रह के सितम तुमने कुछ और भी ढाया है।
नम हो गईं महफिल में सभी की आंखे
हाले दिल उसने कुछ इस तरह सुनाया है।
मिरे आगे आज तो कुछ चांद भी शरमाया है।
मांग मेरी मोती , सितारों से भर गई।
माथे पे मेरे आज महताब जगमागाया है।
लम्स ने तेरे मुझ पे जादू सा कर दिया।
हर शख्स मेरी जानिब तक के मुस्कुराया है।
एक खुनक सी बिखर गई है मौसम में ।
हवाओं ने फिर से कोई नया गीत गुनगुनाया है।
**********************************
तेरी कमगोई से पहले ही थे गिले बहुत,
चुप रह के सितम तुमने कुछ और भी ढाया है।
नम हो गईं महफिल में सभी की आंखे
हाले दिल उसने कुछ इस तरह सुनाया है।
Saturday, June 25, 2005
उदासी और कविता
उदासी और मन का जरूर
कविता से कुछ गहरा नाता है;
जहां घिरे कुछ बादल गम के ,
गीत नया बन जाता है!
आंखे हैं या बादल हैं ये;
भेद न इनका हम जानें.
झङी लगी हो जब अश्कों की,
नज़र कहां कुछ आता है।
सांझा दर्द है हम दोनों का
आंखे मेरी, आंसू तेरे;
बहुत प्यार हो जब 'हम-तुम' में
कुछ का कुछ हो जाता है।
P.b. Shelley का एक वाक्य याद आता है:-
Our sweetest songs are those that come from saddest thoughts.
कविता से कुछ गहरा नाता है;
जहां घिरे कुछ बादल गम के ,
गीत नया बन जाता है!
आंखे हैं या बादल हैं ये;
भेद न इनका हम जानें.
झङी लगी हो जब अश्कों की,
नज़र कहां कुछ आता है।
सांझा दर्द है हम दोनों का
आंखे मेरी, आंसू तेरे;
बहुत प्यार हो जब 'हम-तुम' में
कुछ का कुछ हो जाता है।
P.b. Shelley का एक वाक्य याद आता है:-
Our sweetest songs are those that come from saddest thoughts.
Monday, June 13, 2005
मित्र
मित्र तुम कितने भले हो!
तम से भरे इस सघन वन में;
दीप के जैसे जले हो!
मित्र तुम कितने भले हो!
तुम वो नहीं जो साथ छोङो;
या मुश्किलों में मुंह को मोङो।
राह के हर मील पर तुम,
निर्देश से बनकर खङे हो।
मित्र तुम कितने भले हो!
संशयों में मन घिरा जब;
तुम ही ने तो था उबारा।
पार्थ हूं जो मैं कभी,
तुम सारथि मेरे बने हो।
मित्र तुम कितने भले हो!
नयन से ढलें मोती कभी तो,
हांथ सीपी हैं तुम्हारे।
हर एक क्रन्दन पर मेरे तुम
अश्रु बनकर भी झरे हो।
मित्र तुम कितने भले हो!
भंवर में था मन घिरा जब;
तिनके का भी न था सहारा।
डगमागाती सी नाव की तब,
पतवार तुम ही तो बने हो।
मित्र तुम कितने भले हो!
तम से भरे इस सघन वन में;
दीप के जैसे जले हो!
मित्र तुम कितने भले हो!
तुम वो नहीं जो साथ छोङो;
या मुश्किलों में मुंह को मोङो।
राह के हर मील पर तुम,
निर्देश से बनकर खङे हो।
मित्र तुम कितने भले हो!
संशयों में मन घिरा जब;
तुम ही ने तो था उबारा।
पार्थ हूं जो मैं कभी,
तुम सारथि मेरे बने हो।
मित्र तुम कितने भले हो!
नयन से ढलें मोती कभी तो,
हांथ सीपी हैं तुम्हारे।
हर एक क्रन्दन पर मेरे तुम
अश्रु बनकर भी झरे हो।
मित्र तुम कितने भले हो!
भंवर में था मन घिरा जब;
तिनके का भी न था सहारा।
डगमागाती सी नाव की तब,
पतवार तुम ही तो बने हो।
मित्र तुम कितने भले हो!
Wednesday, June 08, 2005
मेरा परिचय
शब्द ही हैं मेरे आईना मेरा;
ढूंढती फिरती हूं कबसे,
मैं खुद ही का पता!
खुद के बारे में कुछ कहना, अपना परिचय देनाकुछ कठिन काम सा लगता है। लगता है जैसे एक जी हुयी कहानी को फिर से कहना या उङते फिरते तितली से शब्दों को तस्वीर बन जाने की सजा देना।
वैसे सीधे साधे शब्दों में कहें, तो कुछ मुश्किल भी नहीं है। तो शुरु करते हैं, नाम-सभी का एक होता है, मां पापा का दिया हुआ, पर पापा कहते हैं हमने अपना नाम खुद रखा था 'सारिका' जिसका अर्थ होता है 'मैना'। बाकी तो सब सोनू ही कहकर बुलाते हैं। अगस्त १९७६ को इस दुनिया में आये, स्थान था फतेहगढ (फर्रूखाबाद) [उत्तर प्रदेश]। शिक्षा-दीक्षा हुयी पहले फतेहगढ में और बाद में बरेली से इतिहास में स्नातकोत्तर किया। पढाई में हमेशा औसत ही रहे। पर भावुकता ने कलम से दोस्ती करा दी और बस भावनाओं को लव्ज़ों में ढालकर नज़्मों का रूप देते रहे। लिखा बहुत कुछ पर जाने क्यों कभी कुछ सम्भाल कर नहीं रख पाये।
पढाई खत्म हुयी तो फिर आती है विवाह की बारी- जैसे हर लङकी का दूसरा जन्म होता है, हमारे साथ भी ऎसे ही कुछ हुआ। इसे आध्यात्मिक विवाह कहें तो अतिशयोक्ति न होगी। हमारे आध्यात्मिक गुरु श्री पी. राजगोपालाचारी जी ने हमें चुना दक्षिण (हैदराबाद) के वेंकट सोनाथी के लिये, और ये चयन धर्म, जाति और भाषा के परे था। २४ जुलाई२००० को बिना किसी सामाजिक रीति-रिवाज के (बिना सात फेरों के) एक आध्यात्मिक समारोह में हम अपने जीवन-साथी के साथ नव-जीवन की ओर अग्रसर हो गये। विवाह ने हमें उत्तर से दक्षिण ही नहीं पहुंचाया बल्कि सात समुन्दर पार भी पहुंचा दिया, और साथ में बना दिया एक नन्ही सी कली की माँ!
तो है तो ये सीधी-सरल सी कहानी जो किसी के भी जीवन से मिलती-जुलती हो सकती है। मगर हम खुद के बारे में जब कभी गौर से सोंचते हैं तो खुद को एक बेटी, बहन, पत्नी और माँ से कहीं अलग हटकर एक एक अनोखी लङकी के रूप में पाते हैं जो स्वच्छन्द है, आजाद है जो किन्ही बन्धनों को नहीं मानती, जिसका बचपन अभी भी उसके साथ है,जो चिर यौवना है पर जीवन सन्ध्या को निकट से जानने की चरम उत्कण्ठा रखती है। एक ऎसी लङकी जो कभी तो 'अमृता प्रीतम' की 'अनीता' सी लगती है कभी 'शिवानी' की 'कृष्ण कली'। जिसका मन कभी बचपन की कुलांचे भरता है तो अचानक उसे प्रौढ गम्भीरता घेर लेती है। जिसे कभी जीवन की जटिलतायें भी विचलित नहीं कर पाती, पर कभी किसी का छोटा सा दर्द रुला जाता है......और ये फेहरिस्त बहुत लम्बी, बस चलती ही जायेगी। तो इसे बस यहीं विराम देते हैं बाद में फेर बदल तो होते ही रहेंगे।
ढूंढती फिरती हूं कबसे,
मैं खुद ही का पता!
खुद के बारे में कुछ कहना, अपना परिचय देनाकुछ कठिन काम सा लगता है। लगता है जैसे एक जी हुयी कहानी को फिर से कहना या उङते फिरते तितली से शब्दों को तस्वीर बन जाने की सजा देना।
वैसे सीधे साधे शब्दों में कहें, तो कुछ मुश्किल भी नहीं है। तो शुरु करते हैं, नाम-सभी का एक होता है, मां पापा का दिया हुआ, पर पापा कहते हैं हमने अपना नाम खुद रखा था 'सारिका' जिसका अर्थ होता है 'मैना'। बाकी तो सब सोनू ही कहकर बुलाते हैं। अगस्त १९७६ को इस दुनिया में आये, स्थान था फतेहगढ (फर्रूखाबाद) [उत्तर प्रदेश]। शिक्षा-दीक्षा हुयी पहले फतेहगढ में और बाद में बरेली से इतिहास में स्नातकोत्तर किया। पढाई में हमेशा औसत ही रहे। पर भावुकता ने कलम से दोस्ती करा दी और बस भावनाओं को लव्ज़ों में ढालकर नज़्मों का रूप देते रहे। लिखा बहुत कुछ पर जाने क्यों कभी कुछ सम्भाल कर नहीं रख पाये।
पढाई खत्म हुयी तो फिर आती है विवाह की बारी- जैसे हर लङकी का दूसरा जन्म होता है, हमारे साथ भी ऎसे ही कुछ हुआ। इसे आध्यात्मिक विवाह कहें तो अतिशयोक्ति न होगी। हमारे आध्यात्मिक गुरु श्री पी. राजगोपालाचारी जी ने हमें चुना दक्षिण (हैदराबाद) के वेंकट सोनाथी के लिये, और ये चयन धर्म, जाति और भाषा के परे था। २४ जुलाई२००० को बिना किसी सामाजिक रीति-रिवाज के (बिना सात फेरों के) एक आध्यात्मिक समारोह में हम अपने जीवन-साथी के साथ नव-जीवन की ओर अग्रसर हो गये। विवाह ने हमें उत्तर से दक्षिण ही नहीं पहुंचाया बल्कि सात समुन्दर पार भी पहुंचा दिया, और साथ में बना दिया एक नन्ही सी कली की माँ!
तो है तो ये सीधी-सरल सी कहानी जो किसी के भी जीवन से मिलती-जुलती हो सकती है। मगर हम खुद के बारे में जब कभी गौर से सोंचते हैं तो खुद को एक बेटी, बहन, पत्नी और माँ से कहीं अलग हटकर एक एक अनोखी लङकी के रूप में पाते हैं जो स्वच्छन्द है, आजाद है जो किन्ही बन्धनों को नहीं मानती, जिसका बचपन अभी भी उसके साथ है,जो चिर यौवना है पर जीवन सन्ध्या को निकट से जानने की चरम उत्कण्ठा रखती है। एक ऎसी लङकी जो कभी तो 'अमृता प्रीतम' की 'अनीता' सी लगती है कभी 'शिवानी' की 'कृष्ण कली'। जिसका मन कभी बचपन की कुलांचे भरता है तो अचानक उसे प्रौढ गम्भीरता घेर लेती है। जिसे कभी जीवन की जटिलतायें भी विचलित नहीं कर पाती, पर कभी किसी का छोटा सा दर्द रुला जाता है......और ये फेहरिस्त बहुत लम्बी, बस चलती ही जायेगी। तो इसे बस यहीं विराम देते हैं बाद में फेर बदल तो होते ही रहेंगे।
Saturday, June 04, 2005
यादें
तुम कही तो होगे
हमें याद तो करते होगे।
यादें भूलाना आसां होता
तो हम कबके तुम्हे
भूल गये होते;पर
तुम अब भी
चुपके से
कभी किसी खिङकी से,
या किसी दरवाजे से
यादों में दस्तक दे जाते हो।
अपने कहीं अतीत में होने का
अहसास करा जाते हो
फ़िर ऎसे ही कहीं
हम भी तो
तुम्हारी यादों के किन्ही कोनों में
ज़िन्दा होंगे।
बेवजह किसी की बातों में
या यूं ही किसी के हंसने में
हम तुमको दिख जाते होंगे।
और फ़िर तुम कुछ झल्लाकर
या मुस्कुराकर
मेरी यादों को
दिल से भी दूर झटकते होगे।
दुनिया की रंगीनी में
कुछ रंग खुशी के तलाशते होगे।
....
ये जाने कैसा रिश्ता है
जो कभी बना नहीं
पर जाने कितना गहरा है
जो कहीं नहीं होकर भी
किस शान से दिलों में जिन्दा है।
हमें याद तो करते होगे।
यादें भूलाना आसां होता
तो हम कबके तुम्हे
भूल गये होते;पर
तुम अब भी
चुपके से
कभी किसी खिङकी से,
या किसी दरवाजे से
यादों में दस्तक दे जाते हो।
अपने कहीं अतीत में होने का
अहसास करा जाते हो
फ़िर ऎसे ही कहीं
हम भी तो
तुम्हारी यादों के किन्ही कोनों में
ज़िन्दा होंगे।
बेवजह किसी की बातों में
या यूं ही किसी के हंसने में
हम तुमको दिख जाते होंगे।
और फ़िर तुम कुछ झल्लाकर
या मुस्कुराकर
मेरी यादों को
दिल से भी दूर झटकते होगे।
दुनिया की रंगीनी में
कुछ रंग खुशी के तलाशते होगे।
....
ये जाने कैसा रिश्ता है
जो कभी बना नहीं
पर जाने कितना गहरा है
जो कहीं नहीं होकर भी
किस शान से दिलों में जिन्दा है।
वक्त का बजरा
वक्त का बजरा;
क्यूं बहता रहता है बेहिसाब ,
बेमक्सद सा।
लहरों की आजमाइश में ,
डूबता- उतराता
बहता रह्ता है ,
बस चुप-चुप सा।
दिन आते हैं ....
गुजर जाते हैं.....
कुछ मानूस,
कुछ अजनबी
जैसे किसी अर्गनी पर
टंग कर उतर जाते हैं।
बस वक्त खङा रहता है
ठिठका सा!
ख्वाबों की
सपनीली सतहों पर
जहां सब कुछ
मुट्ठी में बन्द
रेत सा लगता है
मन क्यूं पहुंच जाता है
और तकता रहता है
बेबस सा!
--सारिका
क्यूं बहता रहता है बेहिसाब ,
बेमक्सद सा।
लहरों की आजमाइश में ,
डूबता- उतराता
बहता रह्ता है ,
बस चुप-चुप सा।
दिन आते हैं ....
गुजर जाते हैं.....
कुछ मानूस,
कुछ अजनबी
जैसे किसी अर्गनी पर
टंग कर उतर जाते हैं।
बस वक्त खङा रहता है
ठिठका सा!
ख्वाबों की
सपनीली सतहों पर
जहां सब कुछ
मुट्ठी में बन्द
रेत सा लगता है
मन क्यूं पहुंच जाता है
और तकता रहता है
बेबस सा!
--सारिका
Friday, June 03, 2005
शब्द.....
शब्द.....
क्या हैं आखिर शब्द? अक्षरों से भरी एक उंजलि ही तो हैं,
जो बनते हैं उदगार कितने बेचैन ह्र्दयों का...
कभी गीत का रूप लेते हैं ये शब्द ,कभी नज़्म का।
कभी कहते हैं कोई कथा, कभी बयान करते हैं कोई किस्सा।
कभी मौन होकर ही कह देते हैं किन्ही अनकही बातों को।
उकेर सकते हैं ये शब्द पत्थर की किसी मूरत को...
कभी ये शब्द इन्द्रधनुषी रंग बिखेरते हैंकिसी चित्रकार की तूलिका से।
शब्दों का नहीं है कोई आदि या अन्त ...,
युगों से ये खुद ही हैं पहचान अपनी गवाह हैं इतिहास के!
इन्हीं जादुई अक्षरों से भरी ये उंजलि ...
अर्पित है ये शब्दांजलि!
क्या हैं आखिर शब्द? अक्षरों से भरी एक उंजलि ही तो हैं,
जो बनते हैं उदगार कितने बेचैन ह्र्दयों का...
कभी गीत का रूप लेते हैं ये शब्द ,कभी नज़्म का।
कभी कहते हैं कोई कथा, कभी बयान करते हैं कोई किस्सा।
कभी मौन होकर ही कह देते हैं किन्ही अनकही बातों को।
उकेर सकते हैं ये शब्द पत्थर की किसी मूरत को...
कभी ये शब्द इन्द्रधनुषी रंग बिखेरते हैंकिसी चित्रकार की तूलिका से।
शब्दों का नहीं है कोई आदि या अन्त ...,
युगों से ये खुद ही हैं पहचान अपनी गवाह हैं इतिहास के!
इन्हीं जादुई अक्षरों से भरी ये उंजलि ...
अर्पित है ये शब्दांजलि!
कौन हो तुम
अनकही बातें
कौन हो?
कुछ तो कहो तुम!
स्वर्ण हो ?
या हो रजत तुम!
आने से तुम्हारे मन खिला है;
पर कहीं तूफ़ां तो नहीं हो?
बहार हो ?
या हो खिजा तुम!
लगते तो हो प्रातः किरण जैसे;
पर कहीं रात्रि तो नहीं हो?
उषा हो?
या हो निषा तुम!
कहती हैं आंखे कुछ तो तुम्हारी;
पर कहीं ये कुछ वहम न हो,
यथार्त हो?
या हो कल्पना तुम!
हैं कितनी गहरी बातें तुम्हारी,
कितने जाने डूब गये हों;
नदिया हो?
या हो सागर तुम!
साथ तुम्हारा भला लगता है;
पर इस रिश्ते को नाम क्या दूं?
अपने हो?
या हो अजनबी तुम!
--सारिका सक्सेना
कौन हो?
कुछ तो कहो तुम!
स्वर्ण हो ?
या हो रजत तुम!
आने से तुम्हारे मन खिला है;
पर कहीं तूफ़ां तो नहीं हो?
बहार हो ?
या हो खिजा तुम!
लगते तो हो प्रातः किरण जैसे;
पर कहीं रात्रि तो नहीं हो?
उषा हो?
या हो निषा तुम!
कहती हैं आंखे कुछ तो तुम्हारी;
पर कहीं ये कुछ वहम न हो,
यथार्त हो?
या हो कल्पना तुम!
हैं कितनी गहरी बातें तुम्हारी,
कितने जाने डूब गये हों;
नदिया हो?
या हो सागर तुम!
साथ तुम्हारा भला लगता है;
पर इस रिश्ते को नाम क्या दूं?
अपने हो?
या हो अजनबी तुम!
--सारिका सक्सेना
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